GST काउंसिल की 57वीं बैठक: रजिस्ट्रेशन से रिफंड तक 13 बड़े बदलाव, व्यापारियों को मिलेगी बड़ी राहत
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नई दिल्ली। GST काउंसिल की 57वीं बैठक में इस बार दरों में बदलाव के बजाय कारोबार को आसान बनाने (Ease of Doing Business) पर पूरा जोर रहा। काउंसिल ने रजिस्ट्रेशन, रिटर्न फाइलिंग और रिफंड की जटिल प्रक्रियाओं को डिजिटल और ऑटोमेटेड बनाने के लिए 13 बड़े सुधारों को मंजूरी दी है।

रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया हुई पूरी तरह डिजिटल

अब रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी तरह ऑटोमेटेड होगी, जिससे अधिकारियों का मानवीय हस्तक्षेप कम होगा। जिन आवेदकों का जोख़िम कम है और जिनका मासिक आउटपुट टैक्स 2.5 लाख रुपये से कम है, उन्हें मात्र 3 दिनों के भीतर ऑटोमैटिक अप्रूवल मिल जाएगा। इसके अलावा, रजिस्ट्रेशन फॉर्म को स्मार्ट बनाया गया है, जो केवल जरूरी फील्ड्स ही दिखाएगा।

बदलाव अब पलक झपकते होंगे

ट्रेड नेम, पार्टनर की जानकारी या पते में बदलाव जैसे आम कार्यों के लिए अब लंबी प्रक्रिया की जरूरत नहीं होगी। ऐसे बदलाव अब सिस्टम द्वारा अपने आप स्वीकार कर लिए जाएंगे। काउंसिल का मानना है कि इससे आवेदनों का 65% हिस्सा बिना किसी परेशानी के प्रोसेस हो जाएगा।

रिटर्न फाइलिंग की गलतियों पर लगाम

रिटर्न में डेटा एंट्री की गलतियों को कम करने के लिए काउंसिल ने इंटीग्रेटेड सुधार किए हैं। अब यदि कोई सेलर बिक्री के आंकड़ों में बदलाव करता है, तो वह सीधे बायर के स्टेटमेंट में रिफ्लेक्ट होगा। साथ ही, इनवॉइस मैनेजमेंट सिस्टम के जरिए बायर केवल उन्हीं इनवॉइस को स्वीकार कर सकेंगे, जिन्हें वे खुद वैलिडेट करेंगे। गलत जीएसटी नंबर दर्ज होने जैसी पुरानी गलतियों को सुधारने की सुविधा भी अब टैक्सपेयर्स को मिलेगी।

रिफंड प्रक्रिया में तेजी

रिफंड पाने के लिए अब लंबा इंतजार नहीं करना होगा। पावती (Acknowledgement) मिलने की समय-सीमा को 15 दिन से घटाकर 10 दिन कर दिया गया है। यदि इस अवधि में कोई आपत्ति नहीं आती, तो रिफंड स्वतः मंजूर माना जाएगा। 90% रिफंड अब सिस्टम द्वारा ऑटो-अप्रूव होंगे, और कैश लेजर वाले रिफंड तो पूरी तरह से बिना किसी मानवीय भागीदारी के प्रोसेस किए जाएंगे।

कानूनी और अनुपालन बोझ में कमी

अनावश्यक नोटिस और विवादों को कम करने के लिए काउंसिल ने नियम सख्त कर दिए हैं। अब 10,000 रुपये से कम की राशि के लिए कोई भी नोटिस जारी नहीं किया जाएगा। इसके अलावा, नोटिस भेजने और सुनवाई की प्रक्रिया को पूरी तरह से स्टैंडर्डाइज (Standardized) किया गया है, ताकि व्यापारियों को बेवजह कानूनी उलझनों में न फंसना पड़े।

इन सुधारों का सीधा मकसद सिस्टम को पारदर्शी बनाना और छोटे व्यापारियों के अनुपालन (compliance) खर्च को कम करना है।

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