मशहूर अभिनेता नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर को निधन हो गया है। उनके जाने की खबर ने न केवल फिल्मी गलियारों में बल्कि उन आम लोगों के घरों में भी मातम फैला दिया है, जिनके लिए नाना किसी मसीहा से कम नहीं थे।
सादगी और परोपकार की मिसाल नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ में हुआ था। उन्हें उनके बेहतरीन अभिनय के लिए तो जाना ही जाता था, लेकिन उनकी असली पहचान गरीबों और वंचितों के प्रति उनका समर्पण था। उन्होंने कभी धर्म या जाति देखकर नहीं, बल्कि इंसानियत के नाते लोगों का दर्द बांटा।
बीड की महिलाओं के लिए बने सहारा महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाकों, खासकर बीड में जब आत्महत्या और भुखमरी ने परिवारों की कमर तोड़ दी थी, तब नाना पाटेकर आगे आए। उन्होंने मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर नाम फाउंडेशन की नींव रखी। इस संस्था ने विधवाओं और गरीब महिलाओं को सिलाई मशीन, चक्कियां और मवेशी देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया।
मशीन नहीं, रोजी-रोटी का जरिया थी बीड की रहने वाली राजश्री उन महिलाओं में शामिल हैं, जिनकी जिंदगी नाना की मदद से बदली। करीब 10 साल पहले, जब राजश्री के पति दुर्घटना के बाद बिस्तर पर आ गए थे, तब उनके घर की जिम्मेदारी राजश्री के कंधों पर थी। तब नाम फाउंडेशन से मिली सिलाई मशीन ने उनके परिवार को नया जीवन दिया।
भावुक हुईं राजश्री राजश्री बताती हैं कि उस मशीन की मदद से उन्होंने सिलाई का काम शुरू किया और आज वह रोजाना 400 से 500 रुपये तक कमा लेती हैं। नाना के निधन पर वह फफक कर रो पड़ीं और कहा, जिसने हमारे घर में लक्ष्मी लाई, वो चला गया। उन जैसे सैकड़ों लोगों के लिए नाना पाटेकर सिर्फ एक सेलिब्रिटी नहीं, बल्कि वो सहारा थे जिसने अंधेरे जीवन में रोशनी की किरण दिखाई थी।
*#WATCH | Goa: People pay their last respects to veteran actor Nana Patekar at GMC morgue in Bambolim. He passed away this morning. pic.twitter.com/MfM2Xjt0kZ
— ANI (@ANI) October 8, 2026
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