रूस की लैब दुर्घटना और ब्लैक डेथ का खौफ: क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
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रूस के साइबेरिया स्थित एक एंटी-प्लेग इंस्टीट्यूट में 28 वर्षीय दार्या शिपिलोवा की रहस्यमयी निमोनिया से मौत ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। हालांकि रूसी सरकार ने आधिकारिक तौर पर इसे प्लेग नहीं माना है, लेकिन शक की सुई लैब में हाल ही में टूटी एक टेस्ट ट्यूब पर टिकी है जिसमें प्लेग का बैक्टीरिया मौजूद था।

इस घटना ने 14वीं सदी की उस खौफनाक महामारी की याद ताजा कर दी है जिसने यूरोप की एक-तिहाई से आधी आबादी को काल के गाल में समा दिया था। इसे ब्लैक डेथ के नाम से जाना जाता है।

ब्लैक डेथ: जब मौत का तांडव हुआ आम

1347 से 1351 के बीच फैली यह महामारी मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक थी। उस दौर में चिकित्सा विज्ञान विकसित नहीं था, न ही लोगों को सूक्ष्मजीवों (बैक्टीरिया) की जानकारी थी।

महामारी का मुख्य कारण येरसिनिया पेस्टिस (Yersinia pestis) नामक जीवाणु था। यह चूहों पर रहने वाले पिस्सुओं के माध्यम से मनुष्यों तक फैलता था। संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने से भी यह बीमारी हवा के जरिए फैलने लगी थी।

कैसे फैली थी यह तबाही?

माना जाता है कि यह बीमारी मध्य एशिया के व्यापारिक मार्गों के जरिए यूरोप पहुंची। 1347 में जब काला सागर के बंदरगाहों पर जहाज पहुंचे, तो उनके साथ आए चूहों और पिस्सुओं से संक्रमण बंदरगाहों से होता हुआ पूरे यूरोप में जंगल की आग की तरह फैल गया।

उस समय लोग बीमारी का कारण खराब हवा या ईश्वरीय प्रकोप को मानते थे। इस अज्ञानता के कारण संक्रमण रोकने के उपाय पूरी तरह विफल रहे और शहरों के शहर श्मशान में बदल गए।

बीमारी के खौफनाक लक्षण

प्लेग के तीन प्रमुख रूप थे। सबसे आम ब्यूबोनिक प्लेग था, जिसमें गले, बगल या जांघों में दर्दनाक गांठें बन जाती थीं। यदि संक्रमण खून में फैल जाए, तो उसे सेप्टीसीमिक प्लेग कहा गया। वहीं, फेफड़ों को प्रभावित करने वाला न्यूमोनिक प्लेग सबसे खतरनाक था, क्योंकि यह सीधे सांस के जरिए फैलता था।

क्वारंटीन की नींव और समाज का पतन

उस दौर में जब लोगों ने देखा कि संक्रमण नहीं रुक रहा है, तो अधिकारियों ने जहाजों और बाहरी लोगों को रोकने के लिए क्वारंटीन की अवधारणा को जन्म दिया। हालाँकि, उस समय खौफ का स्तर इतना था कि अक्सर शवों को दफनाने के लिए भी लोग नहीं मिलते थे।

अफवाहों और अंधविश्वास ने हिंसा को जन्म दिया। कई निर्दोष समुदायों को बीमारी फैलाने का दोषी मानकर प्रताड़ित किया गया। समाज का आर्थिक ढांचा चरमरा गया, खेत खाली रह गए और मजदूरी की कमी ने उत्पादन को ठप कर दिया।

क्या आज हम सुरक्षित हैं?

ब्लैक डेथ का सबक यह है कि महामारी केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट भी है। आज हमारे पास आधुनिक चिकित्सा, एंटीबायोटिक्स और जांच सुविधाएं हैं।

डॉ. एस. चटर्जी जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि आज भी प्लेग का खतरा बना रहता है, खासकर अगर सावधानी न बरती जाए। रूस की हालिया घटना यह याद दिलाने के लिए काफी है कि वैज्ञानिक संस्थानों में जरा सी चूक मानवता के लिए कितना बड़ा संकट खड़ा कर सकती है। इतिहास हमें सिखाता है कि किसी भी महामारी से निपटने के लिए विज्ञान, सही जानकारी और सतर्कता ही सबसे बड़ा हथियार हैं।

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