मतदाता सूची से नाम हटाने पर पूर्व SC जज नरीमन का बड़ा हमला, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठाए गंभीर सवाल
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मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर उपजा विवाद अब न्यायिक गलियारों में बड़ी बहस का मुद्दा बन गया है। सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जस्टिस उज्ज्वल भुइयां के बाद, अब पूर्व जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने भी इस प्रक्रिया पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने इसे नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन बताया है।

वोट देने का अधिकार गंभीर खतरे में राजकोट में एक व्याख्यान के दौरान जस्टिस नरीमन ने स्पष्ट कहा कि लोकतंत्र में आम नागरिक का सबसे महत्वपूर्ण अधिकार वोट देने का अधिकार है, जो आज खतरे में है। उन्होंने चुनाव आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली पर निशाना साधते हुए कहा कि संवैधानिक संस्था को अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से निभानी चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप कर लोकतंत्र की मर्यादा बचाएगा।

बंगाल का डेटा और 90 लाख वोटरों का निष्कासन जस्टिस नरीमन ने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा कि SIR प्रक्रिया के दौरान लगभग 90 लाख मतदाताओं को सूची से बाहर कर दिया गया। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि जिन लोगों ने इसके खिलाफ अपील की, उनमें से 93% मामलों में चुनाव आयोग का फैसला गलत पाया गया और मतदाता सही निकले। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि इतनी बड़ी संख्या में लोग वैध थे, तो उन्हें सूची से बाहर ही क्यों किया गया?

लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल पूर्व जज ने इस पूरी प्रक्रिया को गैर-कानूनी करार दिया। उन्होंने कहा कि नागरिकों को मताधिकार से वंचित करना महज प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित प्रयास है। उनके अनुसार, इसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ा और सत्ता परिवर्तन में बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने इसे नागरिक अधिकारों के साथ खिलवाड़ बताया।

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर चिंता जस्टिस नरीमन ने विशेष रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की नियुक्ति प्रक्रिया को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि नियुक्ति पैनल में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सरकार द्वारा नामित मंत्री का होना चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर संदेह पैदा करता है। उन्होंने सुझाव दिया कि आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया में अधिक संस्थागत संतुलन और पारदर्शिता की आवश्यकता है।

संविधान पीठ के फैसले की प्रतीक्षा CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून पर चल रही कानूनी लड़ाई का जिक्र करते हुए नरीमन ने कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का जल्द फैसला आना जरूरी है। उन्होंने जोर दिया कि लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए आयोग का सरकार के प्रभाव से मुक्त होना अनिवार्य है।

न्यायपालिका में बढ़ती चिंताएं जस्टिस नरीमन की यह टिप्पणी जस्टिस उज्ज्वल भुइयां के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि नागरिकों को मताधिकार से वंचित कर उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना संवैधानिक व्यवस्था के विरुद्ध है। अब दो वरिष्ठ जजों द्वारा उठाए गए इन सवालों ने चुनाव आयोग की जवाबदेही और मतदाता सूची प्रबंधन की पूरी प्रक्रिया को देश की सबसे बड़ी बहस का विषय बना दिया है।

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