ठाकरे भाइयों की जुगलबंदी : उद्धव-राज ने एक मंच से फूंका चुनावी बिगुल, चुनाव आयोग पर उठाए गंभीर सवाल
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महाराष्ट्र की सियासत में रविवार (4 अक्टूबर) को एक ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला। सियासी मतभेदों को दरकिनार कर ठाकरे परिवार के दो दिग्गज—उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे—एक साथ सड़क पर उतरे। मुंबई में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ निकाला गया यह संयुक्त मार्च देश की चुनावी पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर गया।

वोट चोर के खिलाफ हल्ला बोल मेट्रो सिनेमा से बीएमसी मुख्यालय तक निकले इस विशाल मार्च में हजारों समर्थकों ने वोट चोर, गद्दी छोड़ और चुनाव आयोग हटाओ, देश बचाओ के नारों से आसमान गूंजा दिया। उद्धव और राज ठाकरे ने साफ कर दिया कि उनकी लड़ाई अब व्यक्तिगत नहीं, बल्कि लोकतंत्र को बचाने की है।

ठाकरे बंधुओं की तीन मुख्य मांगें

प्रदर्शन के केंद्र में चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता रही। दोनों नेताओं ने मुख्य रूप से तीन बड़ी मांगें रखी हैं:

  1. SIR रद्द हो: राज ठाकरे ने महाराष्ट्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को तत्काल रद्द करने की मांग की। उनका दावा है कि इसके जरिए करीब 2 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने की साजिश रची जा रही है। उन्होंने सवाल किया कि ये 2 करोड़ लोग कौन हैं और इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाने की जरूरत क्यों है?
  2. EVM नहीं, बैलेट पेपर चाहिए: राज ठाकरे ने चुनाव प्रक्रिया पर अविश्वास जताते हुए मांग की कि चुनाव ईवीएम (EVM) के बजाय पुराने तरीके यानी बैलेट पेपर से कराए जाएं।
  3. चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग: उद्धव ठाकरे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति प्रक्रिया को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने सीजेआई (CJI) को नियुक्ति समिति से बाहर कर चुनाव आयोग को बीजेपी का हथियार बना दिया है।

सरकार जनता तय करेगी, आयोग नहीं राज ठाकरे ने कड़े शब्दों में कहा कि सत्ता का फैसला जनता को करना चाहिए, चुनाव आयोग को नहीं। उन्होंने महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर संदेह जताते हुए कहा कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच मतदाताओं की संख्या में अचानक हुई भारी बढ़ोतरी संदिग्ध है।

उद्धव ठाकरे ने इस दौरान केंद्र सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए कहा, हिटलर भी तानाशाह था, लेकिन अंत में उसे खुद को गोली मारनी पड़ी। जो लोग आज मनमानी कर रहे हैं, उन्हें यह याद रखना चाहिए।

विपक्ष का साझा सुर इस प्रदर्शन को संजय राउत, अनिल देसाई और अरविंद सावंत जैसे नेताओं का भी समर्थन मिला। संजय राउत ने इसे तानाशाही के खिलाफ विद्रोह बताया, तो अरविंद सावंत ने कहा कि दोनों ठाकरे भाइयों का एक मंच पर आना लोकतंत्र की रक्षा के लिए नई ऊर्जा है।

कुल मिलाकर, ठाकरे परिवार की यह एकजुटता महाराष्ट्र की राजनीति में एक नए समीकरण का संकेत दे रही है, जहाँ अब मुख्य मुद्दा संविधान और वोटिंग अधिकार की सुरक्षा बन गया है।

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