11 साल बाद अमेरिका पहुंचे शी जिनपिंग: ट्रंप ने परंपरा तोड़ किया भव्य स्वागत, इन 4 बड़े मुद्दों पर टिकी नजरें
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एक दशक से भी ज्यादा के लंबे इंतजार के बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिकी सरजमीं पर उतरे हैं। उनके स्वागत के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रोटोकॉल को दरकिनार कर खुद जॉइंट बेस एंड्रयूज एयरपोर्ट पहुंचे। इस कदम को बीजिंग के लिए अमेरिका की ओर से एक बड़े कूटनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

ट्रंप ने क्यों बदला प्रोटोकॉल? आमतौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की अगवानी के लिए एयरपोर्ट नहीं जाते, लेकिन ट्रंप ने परंपरा को तोड़कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। ट्रंप ने इसे शानदार स्वागत बताते हुए कहा कि वह जिनपिंग के साथ ईरान और अन्य ज्वलंत मुद्दों पर सीधी और स्पष्ट बात करेंगे।

तीसरी मुलाकात और कूटनीतिक गणित पिछले एक साल में यह दोनों नेताओं की तीसरी सीधी मुलाकात है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों पक्ष व्यापारिक और सैन्य तनाव को बेकाबू होने से बचाना चाहते हैं। नवंबर में चीन में होने वाली APEC समिट और दिसंबर में मियामी में G20 सम्मेलन से पहले यह यात्रा कूटनीतिक मोर्चे पर बेहद अहम मानी जा रही है।

टेबल पर 4 बड़े विवाद इस तीन दिवसीय स्टेट विजिट के दौरान चार प्रमुख मुद्दों पर मंथन होना तय है:

  1. ट्रेड और टैरिफ की जंग: दोनों देशों के बीच व्यापार घाटे को कम करने और टैरिफ पर चल रहे विवाद को सुलझाने के लिए नए फार्मूले पर काम हो रहा है।
  2. AI और टेक रेस: अमेरिका और चीन के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और माइक्रोचिप्स को लेकर खींचतान है। दोनों देश अब पहली बार AI सुरक्षा पर डेटा शेयरिंग पर सहमत हुए हैं।
  3. ताइवान का मुद्दा: ताइवान की सुरक्षा को लेकर अमेरिका की सैन्य मदद और चीन के बढ़ते दबाव के बीच यह मुद्दा चर्चा का केंद्र रहेगा।
  4. रूसी तेल पर सख्ती: अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ लगाने का कानून पारित किया है। चीन के रूसी तेल खरीदने पर ट्रंप का रुख इस मीटिंग का सबसे बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।

घरेलू राजनीति और भारत पर असर वाशिंगटन में जिनपिंग के इस भव्य स्वागत पर सियासी घमासान भी मचा है। कई अमेरिकी सीनेटरों ने चीन के आक्रामक रवैये के चलते इस डिनर का विरोध किया है। वहीं, भारत के लिए यह मीटिंग महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिका-चीन ट्रेड डील और रूसी तेल पर अमेरिकी रुख हमारे ग्लोबल सप्लाई चेन और एनर्जी बाजार को सीधे प्रभावित कर सकता है।

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