आईआईटी बॉम्बे सुसाइड मामला: प्रोफेसर डूला के बचाव में उतरी आईआईटी मद्रास फैकल्टी, निष्पक्ष जांच की मांग
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आईआईटी बॉम्बे के छात्र साहिल वाकोडे की आत्महत्या के मामले में प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज होने के बाद विवाद बढ़ गया है। अब आईआईटी मद्रास फैकल्टी एसोसिएशन ने प्रोफेसर डूला का खुला समर्थन किया है।

प्रोफेसर ने नियमों का पालन किया आईआईटी मद्रास फैकल्टी एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रोफेसर एथायराजा मणि ने बयान जारी कर स्पष्ट किया कि प्रोफेसर डूला ने अपनी ड्यूटी ईमानदारी और संस्थान के नियमों के अनुरूप निभाई थी। एसोसिएशन ने कहा कि शिक्षकों को परीक्षाओं की अखंडता बनाए रखने की जिम्मेदारी दी जाती है, जिसे प्रोफेसर ने बखूबी पूरा किया। उन्हें व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाना गलत है।

संवेदना और समर्थन फैकल्टी एसोसिएशन ने साहिल वाकोडे की मृत्यु पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए उनके परिवार के प्रति संवेदना जताई है। एसोसिएशन ने कहा कि किसी भी छात्र की मौत पूरी अकादमिक बिरादरी के लिए एक बड़ी क्षति है। हालांकि, संस्था ने यह भी साफ किया कि कठिन समय में वे प्रोफेसर डूला के साथ खड़े हैं और इस मामले में उचित प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।

एसोसिएशन की तीन प्रमुख मांगें आईआईटी मद्रास ने सरकार और जांच एजेंसियों के सामने तीन अहम मांगें रखी हैं:

  1. मामले की जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से हो, जिसमें छात्र और परिवार की गरिमा का ध्यान रखा जाए।
  2. जांच पूरी होने से पहले किसी को भी दोषी करार न दिया जाए। संस्था ने मीडिया ट्रायल और सोशल मीडिया पर लग रहे आरोपों को नुकसानदेह बताया।
  3. शैक्षिक कदाचार से निपटने की मौजूदा प्रक्रियाओं की समीक्षा हो ताकि छात्रों के तनाव को संवेदनशीलता के साथ संभाला जा सके।

विवाद की पृष्ठभूमि गौरतलब है कि साहिल वाकोडे का शव हॉस्टल के कमरे में मिला था। आरोप है कि परीक्षा के दौरान मोबाइल का इस्तेमाल करते पकड़े जाने के बाद छात्र ने यह कदम उठाया। आईआईटी बॉम्बे प्रशासन का कहना है कि उसे केवल चेतावनी दी गई थी, कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। वहीं, परिजनों ने इसे संस्थान द्वारा उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव का मामला बताते हुए प्रोफेसर डूला के खिलाफ केस दर्ज कराया है।

आईआईटी बॉम्बे में भी विरोध इससे पहले, आईआईटी बॉम्बे फैकल्टी फोरम ने भी प्रोफेसर डूला का पुरजोर बचाव किया था। परिसर में शिक्षकों ने उनके समर्थन में मार्च निकाला था और इसे अनुचित तरीके से फंसाया गया मामला करार दिया था। फिलहाल, पूरे देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में इस घटना के बाद अकादमिक दबाव और अनुशासनात्मक कार्रवाई की सीमाओं पर बहस छिड़ गई है।

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