इटली में बुर्का-नकाब बैन की तैयारी: मेलोनी के नए फरमान से मचा बवाल, जानें क्या है पूरा मामला
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इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने एक बड़ा ऐलान करके यूरोप की राजनीति में हलचल मचा दी है। मेलोनी ने स्कूलों में बुर्का और नकाब पर प्रतिबंध लगाने की योजना का खाका पेश किया है। उनका तर्क है कि किसी भी परंपरा के नाम पर युवतियों को अपना चेहरा छुपाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

केवल बुर्का नहीं, विदेशी छात्रों पर भी सख्ती

मेलोनी का यह प्रस्ताव सिर्फ ड्रेस कोड तक सीमित नहीं है। इस योजना के तहत स्कूलों में हर कक्षा में विदेशी मूल के छात्रों की संख्या पर कानूनी सीमा तय की जाएगी। इसके अलावा, जिन विदेशी छात्रों के परिवारों को स्कूल व्यवस्था में घुलने-मिलने में दिक्कत आ रही है, उनके अभिभावकों के लिए इतालवी भाषा सीखना अनिवार्य होगा।

क्या हिजाब पर भी है पाबंदी?

मेलोनी के प्रस्ताव में स्पष्ट किया गया है कि यह प्रतिबंध केवल उन परिधानों पर है जो चेहरा ढंकते हैं, जैसे कि बुर्का या नकाब। हिजाब, जिसमें चेहरा खुला रहता है, वह इस दायरे से बाहर है। सरकार का कहना है कि यह कदम महिलाओं की आजादी और उनकी पहचान को सार्वजनिक करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

यूरोप में कहां-कहां लागू है ऐसा कानून?

यूरोप में यह चलन नया नहीं है। फ्रांस ने 2011 में सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढंकने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था। इसके बाद बेल्जियम, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, बुल्गारिया, नीदरलैंड्स और स्विट्जरलैंड जैसे देश भी अलग-अलग स्तर पर इस तरह की पाबंदियां लगा चुके हैं। दुनिया भर में करीब दो दर्जन से ज्यादा देशों में चेहरा ढंकने वाले कपड़ों पर किसी न किसी रूप में रोक है।

भारत से कनेक्शन और विवाद

भारत में भी यह मुद्दा सुर्खियों में रह चुका है। कर्नाटक के शिक्षण संस्थानों में हिजाब को लेकर हुआ विवाद देश में धार्मिक स्वतंत्रता बनाम शिक्षण संस्थानों के अनुशासन की एक बड़ी बहस का केंद्र बना था। यह मामला अदालत तक पहुंचा था और आज भी देश में इसे एक मिसाल के तौर पर देखा जाता है।

राजनीतिक मजबूरी या महिला सशक्तिकरण?

विश्लेषकों का मानना है कि इटली में 2027 में आम चुनाव होने हैं। मेलोनी की पार्टी पर कट्टर दक्षिणपंथी प्रतिद्वंद्वियों का दबाव है, जो इमिग्रेशन और सांस्कृतिक पहचान के मुद्दों पर बहुत सख्त रुख अपनाते हैं। ऐसे में मेलोनी का यह कदम चुनावी रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है।

क्या यह कानून तुरंत लागू होगा?

फिलहाल यह केवल एक प्रस्ताव है। इसे इटली की कैबिनेट में रखा जाएगा और फिर संसद से मंजूरी लेनी होगी। इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 60 दिन की समय सीमा तय की गई है। फिलहाल इसे लेकर मुस्लिम संगठनों और मानवाधिकार समूहों के बीच तीखी बहस छिड़ गई है, जहां कुछ इसे महिला अधिकारों की जीत, तो कुछ इसे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने वाला कदम बता रहे हैं।

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