यूपीआई (UPI) पर 2000 रुपये से ज्यादा के पेमेंट पर चार्ज लगाने की खबर ने देश भर में बहस छेड़ दी है। विपक्षी दल इसे विदेशी कंपनियों के दबाव में लिया गया फैसला बता रहे हैं, तो सरकार का तर्क है कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को टिकाऊ बनाने के लिए यह जरूरी है। आखिर इस बदलाव के पीछे की सच्चाई क्या है?
क्यों पड़ी चार्ज लगाने की जरूरत? यूपीआई का नेटवर्क हर साल करीब 20,700 करोड़ रुपये की लागत पर चल रहा है। सर्वर अपग्रेड, साइबर सिक्योरिटी, फ्रॉड मॉनिटरिंग और डेटा सुरक्षा पर हर दिन भारी-भरकम निवेश की आवश्यकता होती है। सरकार अब इस व्यवस्था को सिर्फ सब्सिडी के भरोसे नहीं छोड़ना चाहती। पेमेंट कंपनियां चाहती हैं कि यूपीआई का अपना एक स्थाई रेवेन्यू मॉडल हो, ताकि यह सिस्टम भविष्य में और अधिक सुरक्षित और मजबूत बन सके।
सिर्फ 4 फीसदी ट्रांजेक्शन पर असर सरकार का स्पष्ट कहना है कि हर यूपीआई पेमेंट पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। यह चार्ज मुख्य रूप से 2,000 रुपये से अधिक के उन ट्रांजेक्शन पर लागू होगा, जो ग्राहक दुकानदार को करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, इस दायरे में कुल ट्रांजेक्शन का केवल 4 फीसदी हिस्सा आएगा। छोटे दुकानदारों और कम टर्नओवर वाले व्यापारियों को इन शुल्कों से राहत दी गई है।
अमेरिकी कंपनियों का कनेक्शन क्या है? विपक्ष का आरोप है कि अमेरिकी कंपनियों (जैसे Google Pay और Walmart समर्थित PhonePe) के फायदे के लिए यह नीति लाई गई है। आलोचकों का कहना है कि अमेरिकी ट्रेड रिपोर्ट में भारत के जीरो-चार्ज मॉडल को बाधा बताया गया था। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल विदेशी हिस्सेदारी के आधार पर इसे पूरी तरह अमेरिकी दबाव कहना जल्दबाजी होगी। इसका मुख्य उद्देश्य डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम को आत्मनिर्भर बनाना है।
क्या फिर से कैश बढ़ेगा? सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चार्ज के डर से लोग वापस कैश की ओर मुड़ेंगे? विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे लेन-देन प्रभावित नहीं होंगे, इसलिए रोजमर्रा की खरीदारी में कैश का चलन बढ़ने की संभावना कम है। हालांकि, बड़े ई-कॉमर्स ट्रांजेक्शन और महंगे सामान की खरीदारी में अगर व्यापारी शुल्क ग्राहकों पर डालते हैं, तो लोग कैश या वैकल्पिक माध्यमों की तलाश कर सकते हैं।
निष्कर्ष: सब्सिडी से आत्मनिर्भरता की ओर यूपीआई ने साल 2025-26 में 314 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार किया है। इतने विशाल नेटवर्क का खर्च लगातार सरकारी बजट से उठाना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। सरकार इसे डिजिटल पेमेंट को बंद करने के रूप में नहीं, बल्कि उसे एक स्थाई आर्थिक आधार देने की कोशिश के तौर पर देख रही है। चुनौती यह है कि यह बदलाव ग्राहकों के भरोसे और डिजिटल इंडिया के सपने के बीच सामंजस्य कैसे बिठा पाता है।
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— CNBC-AWAAZ (@CNBC_Awaaz) September 16, 2026
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