आगरा में सरकारी टेंडरों का फर्जी खेल : हैसियत प्रमाणपत्रों के बड़े घोटाले का अंदेशा, प्रशासन सख्त
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आगरा में सरकारी निर्माण कार्यों के टेंडर हासिल करने के लिए फर्जी हैसियत प्रमाणपत्र (Solvency Certificate) का इस्तेमाल एक बड़े घोटाले का रूप लेता जा रहा है। एडीए (आगरा विकास प्राधिकरण) में हुए एक मामले के बाद अब पूरे शहर में सक्रिय फर्जीवाड़े के एक संगठित नेटवर्क की चर्चा तेज हो गई है।

एडीए में उजागर हुआ बड़ा फर्जीवाड़ा

मामले की शुरुआत भाजपा नेता नागेंद्र दुबे गामा की शिकायत से हुई। उन्होंने एडीए में साक्ष्यों के साथ शिकायत की थी कि निर्माण कार्यों के टेंडर हथियाने के लिए डीएम कार्यालय के नाम से फर्जी सॉल्वेंसी सर्टिफिकेट का इस्तेमाल किया गया। जांच में गड़बड़ी मिलने के बाद एडीए ने संबंधित फर्म को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया।

एडीए उपाध्यक्ष एम. अरुन्मोली ने अब इस मामले में महिला ठेकेदार और उनकी फर्म के खिलाफ धोखाधड़ी व कूट रचित दस्तावेज बनाने की एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए हैं। साथ ही, फर्म को मिले पुराने सभी टेंडरों की विस्तृत जांच के निर्देश भी दिए गए हैं।

35 लाख की जगह 60 लाख का हेरफेर

मामला यहीं नहीं रुक रहा है। हाल ही में एक और गंभीर शिकायत सामने आई है, जिसमें 35 लाख रुपये की वास्तविक सॉल्वेंसी को कागजों में 55 से 60 लाख रुपये के बीच दिखाकर सरकारी सिस्टम को गुमराह करने का आरोप है। इस बाबत जिलाधिकारी मनीष बंसल और एडीएम (वित्त एवं राजस्व) से शिकायत की गई है।

संगठित नेटवर्क होने का संदेह

हिंदू महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अज्जू चौहान ने आरोप लगाया है कि आगरा में एक व्यापक नेटवर्क सक्रिय है, जो फर्जी या बढ़ा-चढ़ाकर हैसियत प्रमाणपत्र तैयार कराता है। चौहान का कहना है कि यह केवल एक-दो लोगों का मामला नहीं है, बल्कि इसमें कई बिचौलिए और प्रभावशाली लोग शामिल हो सकते हैं।

इन फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर अयोग्य ठेकेदार बड़े-बड़े सरकारी प्रोजेक्ट हासिल कर लेते हैं, जिससे ईमानदार और सक्षम ठेकेदारों के अवसर मारे जाते हैं। शिकायतकर्ताओं ने इस पूरे रैकेट की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।

प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती

अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या ये फर्जी प्रमाणपत्र केवल चंद ठेकेदारों की निजी चालबाजी है, या फिर इसके पीछे सरकारी विभागों के भीतर बैठा कोई संगठित गिरोह काम कर रहा है? एडीए के मामले में एफआईआर के बाद प्रशासन पर अब पुराने सभी टेंडरों की निष्पक्ष जांच का भारी दबाव है।

यदि जांच में बड़े पैमाने पर धांधली सामने आती है, तो यह टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर बहुत बड़ा सवालिया निशान होगा। फिलहाल, आगरा प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर सभी की निगाहें टिकी हैं।

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