दिल्ली में ब्रिक्स महाजुटान, तो मणिपुर में क्या कर रहे अमेरिकी राजदूत? कूटनीतिक हलचल के मायने
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नई दिल्ली इन दिनों ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के कारण वैश्विक राजनीति का केंद्र बनी हुई है। शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन जैसे दिग्गज नेता दिल्ली में मौजूद हैं, लेकिन इसी बीच अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का मणिपुर दौरा चर्चा का नया विषय बन गया है।

दिल्ली से हजारों मील दूर मिशन दुनिया की नजरें जब दिल्ली में हो रहे ब्रिक्स सम्मेलन पर टिकी हैं, तब अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर पूर्वोत्तर भारत के मणिपुर में सक्रिय हैं। शुक्रवार को इंफाल पहुंचे गोर ने शनिवार को बिष्णुपुर के प्रसिद्ध लोकतक लेक का दौरा किया। उन्होंने वहां नाव की सवारी की और स्थानीय संस्कृति में रुचि दिखाई।

ब्रिक्स से दूरी की सोची-समझी रणनीति राजनीतिक जानकारों का मानना है कि गोर का यह दौरा महज पर्यटन नहीं, बल्कि एक सोची-समझी कूटनीति है। ब्रिक्स सम्मेलन में रूस और चीन की उपस्थिति के बीच, अमेरिका दिल्ली के शोर से खुद को दूर रखना चाहता है। यह अमेरिका की एक ऐसी कूटनीतिक चाल है, जिससे वह भारत की मल्टी-अलाइनमेंट नीति का सम्मान करते हुए खुद को अनावश्यक विवादों से दूर रख रहा है।

पूर्वोत्तर पर क्यों है अमेरिका की नजर? मणिपुर भारत की ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी का प्रवेश द्वार है। म्यांमार और दक्षिण-पूर्व एशिया से निकटता के कारण यह क्षेत्र हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) रणनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। अमेरिकी राजदूत का वहां जाना यह स्पष्ट संकेत देता है कि वाशिंगटन पूरे भारत, विशेषकर रणनीतिक सीमाओं वाले संवेदनशील क्षेत्रों में अपनी सीधी पहुंच और रुचि बनाए रखना चाहता है।

सॉफ्ट पावर का इस्तेमाल लोकतक झील में बोट राइड और स्थानीय लोगों के साथ संवाद करके अमेरिका अपनी सॉफ्ट पावर का विस्तार कर रहा है। जहां दिल्ली में ब्रिक्स देश वैश्विक आर्थिक ढांचे को बदलने की बात कर रहे हैं, वहीं अमेरिका ने पूर्वोत्तर में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर यह संदेश दिया है कि 21वीं सदी की कूटनीति केवल सम्मेलनों तक सीमित नहीं है।

कुल मिलाकर, सर्जियो गोर का यह दौरा ब्रिक्स देशों के लिए एक शांत संदेश है: अमेरिका न केवल भारत के साथ है, बल्कि वह भारत के हर कोने और उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं पर भी बारीकी से नजर गड़ाए हुए है।

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