ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए इस वक्त दिल्ली दुनिया की कूटनीतिक राजधानी बनी हुई है। पूरी दुनिया की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले इस मंच से जो संदेश निकल रहे हैं, उसने अमेरिका और विशेषकर डोनाल्ड ट्रंप की नींद उड़ा दी है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन का भारत दौरा और ब्रिक्स में डी-डालराइजेशन (डॉलर पर निर्भरता खत्म करना) की गूंज इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अब वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिकी दादागिरी के दिन लद रहे हैं।
ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने साफ कर दिया है कि ब्रिक्स देशों को अपनी खुद की करेंसी में व्यापार करना चाहिए। क्रेमलिन के प्रवक्ता डिमित्री पेस्कोव ने भी इस बात की पुष्टि की है कि ब्रिक्स सदस्य अब लगभग 90% लेनदेन अपनी स्थानीय मुद्राओं में कर रहे हैं। पेस्कोव का सीधा आरोप है कि ट्रंप डॉलर को एक राजनीतिक हथियार (वेपन) की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे निपटने के लिए ब्रिक्स का एकजुट होना अनिवार्य है।
डॉलर के विकल्प की इस कवायद का केंद्र ब्रिक्स बैंक (न्यू डेवलपमेंट बैंक) है। 2014 में स्थापित इस बैंक में भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे संस्थापक देशों का दबदबा है। सबसे खास बात यह है कि वर्ल्ड बैंक या आईएमएफ की तरह यहां किसी एक देश का वीटो पावर नहीं चलता। इसका नेतृत्व रोटेशनल है और अब यह बैंक भारतीय रुपये, चीनी युआन और ब्राजीलियाई रियाल जैसे स्थानीय मुद्राओं में लोन जारी कर रहा है।
रातोंरात डॉलर को हटाना संभव नहीं है, क्योंकि ग्लोबल ट्रेड का 80-85% हिस्सा अभी भी स्विफ्ट (SWIFT) नेटवर्क पर निर्भर है। ब्रिक्स का लक्ष्य फिलहाल अपने कुल लोन का 30% हिस्सा स्थानीय मुद्रा में देने का है। यह कदम धीरे-धीरे डॉलर की मजबूती को कम करेगा। ब्रिक्स देशों की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दुनिया की 30% नॉमिनल जीडीपी और 40% से अधिक तेल उत्पादन इन देशों के पास है। जब तेल के बड़े उत्पादक और खरीदार (भारत-चीन) खुद के सिस्टम में ट्रेड करेंगे, तो डॉलर की मांग स्वाभाविक रूप से गिरेगी।
डोनाल्ड ट्रंप का गुस्सा और उनकी धमकियां इसी डर का सबूत हैं। वे खुलेआम कह रहे हैं कि जो देश डॉलर छोड़ेंगे, उन पर 100% टैरिफ लगाया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि यदि ब्रिक्स अपना स्वयं का पेमेंट सिस्टम बनाने में कामयाब हो जाता है, तो अमेरिका के प्रतिबंधों और टैरिफ की औकात क्या रह जाएगी?
अमेरिका को डर है कि चीन ब्रिक्स के माध्यम से उसे सीधे आर्थिक टक्कर दे रहा है। हालांकि, ब्रिक्स का आधिकारिक रुख यही है कि यह गठबंधन किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी स्वायत्तता के लिए बना है। दिल्ली में मोदी, पुतिन और जिनपिंग की बढ़ती नजदीकियां और ईरान की सक्रियता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य का ग्लोबल ऑर्डर अब वाशिंगटन से नहीं, बल्कि ब्रिक्स जैसे मंचों से तय होगा।
BRICS में भारत-चीन-रूस का नया Payment Plan! बौखलाएगा अमेरिका? | Dollar | Trump | BRICS 2026#brics2026 #brics #pmmodi #usdollar #dedollarisation #trump #bricspayment #globalorder@AnchorAnandN @nirajjournalist @Wangu_News18 pic.twitter.com/URSqT1tLzF
— News18 India (@News18India) September 12, 2026
भारत-अमेरिका संबंधों को नई धार: अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का मणिपुर और दार्जिलिंग दौरा
बुमराह की घातक गेंदों के आगे बॉस बेबी का इम्तिहान: 4 गेंदों में खुला अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का सच
हरीश रावत के करीबी पर ED का शिकंजा, पूर्व सीएम ने छोड़े कांग्रेस के दो अहम पद
कश्मीर में NIA का बड़ा प्रहार: 7 ठिकानों पर छापेमारी, पाकिस्तान से जुड़े आतंकी नेटवर्क का होगा पर्दाफाश
80s के लुक में दिखना चाहते हैं आप भी? वैभव सूर्यवंशी की तरह अपनी AI फोटो बनाने का आसान तरीका
9/11 की 25वीं बरसी पर अल-कायदा का खौफनाक प्रोपेगेंडा, मरा हुआ माना जा रहा हमजा बिन लादेन फिर आया नजर
5G के लिए हाई-वोल्टेज ड्रामा: टावर पर तकनीशियन को बांधा, ग्रामीणों का गुस्सा फूटा
सिंटा (CINTAA) का दंगल: सड़क पर भिड़ीं 80 के दशक की मशहूर अभिनेत्रियां, पुलिस को देनी पड़ी चेतावनी
न बिकूंगी, न सुरक्षा की भीख मांगूंगी : भारत लौटकर डॉ. रोहिणी घावरी ने चंद्रशेखर आजाद को दी खुली चुनौती
BRICS दिल्ली डिक्लेरेशन: 18वें शिखर सम्मेलन में बनी सर्वसम्मति, बदलती दुनिया के लिए क्या है नया रोडमैप?