BRICS मेजबानी पर चिदंबरम के सवाल से सियासी घमासान, BJP ने कहा- कांग्रेस को सता रहा FOMO
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भारत को 2026 में होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की मेजबानी मिली है, लेकिन इस उपलब्धि पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम की टिप्पणी ने सियासी गलियारों में बहस छेड़ दी है। चिदंबरम ने भारत को होने वाले फायदों पर सवाल उठाए हैं, जिसे भाजपा ने कांग्रेस की हताशा करार दिया है।

चिदंबरम ने उठाए कूटनीति पर सवाल

पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने ब्रिक्स समिट की उपयोगिता पर संदेह जताते हुए कहा कि उन्हें पिछले 2-3 वर्षों में ब्रिक्स, SCO, G20 या QUAD जैसे मंचों से भारत को मिला कोई ठोस नतीजा दिखाई नहीं देता। उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय मंचों का हिस्सा होने के बावजूद भारत को इनसे कितना लाभ मिल रहा है, यह स्पष्ट नहीं है।

नाराज फूफा वाली मानसिकता: प्रदीप भंडारी

भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने चिदंबरम के बयान पर तीखा पलटवार किया है। उन्होंने चिदंबरम की तुलना नाराज फूफा से करते हुए कहा कि कांग्रेस हर उस घटना का विरोध करती है जिससे भारत का मान बढ़ता है। भंडारी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस पार्टी को FOMO (कुछ छूट जाने का डर) सता रहा है क्योंकि उन्हें एहसास हो गया है कि वे भविष्य में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनते नहीं देख पाएंगे, और न ही कांग्रेस को कभी ऐसे बड़े वैश्विक आयोजनों की मेजबानी का अवसर मिलेगा।

नलिन कोहली का कांग्रेस पर हमला

भाजपा सांसद नलिन कोहली ने कांग्रेस के लेन-देन वाले नजरिए पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि क्या कूटनीति को सिर्फ मुनाफे के चश्मे से देखा जाना चाहिए? कोहली ने तंज कसते हुए कहा कि अगर चिदंबरम के तर्क को मानें, तो 1947 से 2014 तक कांग्रेस की कूटनीति पर भी सवाल उठाए जा सकते हैं।

उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस पार्टी का मकसद केवल पीएम मोदी सरकार के हर काम की आलोचना करना बन गया है। नलिन कोहली ने दो टूक शब्दों में कहा कि यदि कल कोई यह कहे कि उसे कांग्रेस पार्टी से कोई फायदा नहीं दिख रहा, तो क्या कांग्रेस पार्टी अपना अस्तित्व समाप्त कर लेगी?

विपक्ष की हताशा या वाजिब सवाल?

ब्रिक्स जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक सम्मेलन की मेजबानी भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। ऐसे में चिदंबरम के बयान को भाजपा ने देश की साख को प्रभावित करने वाली राजनीति बताया है। वहीं, कांग्रेस का तर्क है कि हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर होने वाले खर्च और उसके बदले मिलने वाले ठोस परिणामों का लेखा-जोखा जनता के सामने रखा जाना चाहिए। फिलहाल, यह बयानबाजी सियासी गलियारों में एक नया विवाद बन गई है।

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