गोरखपुर की बेटी का कमाल: सहजनवा की पहली महिला सेना अधिकारी बनीं रितिका दुबे
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गोरखपुर के सहजनवा तहसील के तिलौरा गांव की रहने वाली 23 वर्षीय रितिका दुबे ने इतिहास रच दिया है। रितिका ने अपनी कड़ी मेहनत और अटूट हौसले के दम पर भारतीय सेना में अधिकारी बनकर न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे क्षेत्र का नाम रोशन किया है। वह सहजनवा तहसील की पहली महिला हैं, जिन्होंने सेना में अधिकारी का पद हासिल किया है।

पहले ही प्रयास में सफलता का परचम रितिका की सफलता का सफर बेहद प्रेरणादायक है। उन्होंने पहले ही प्रयास में सर्विसेज सिलेक्शन बोर्ड (SSB) का साक्षात्कार उत्तीर्ण कर अपनी काबिलियत साबित की। इसके बाद, सितंबर 2025 में चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी (OTA) के लिए उनका चयन हुआ। वहां कठिन प्रशिक्षण पूरा करने के बाद अब वे लेफ्टिनेंट के पद पर तैनात होकर देश की सेवा के लिए तैयार हैं।

भारतीय सेना ने की मुक्त कंठ से सराहना भारतीय सेना की आर्मी ट्रेनिंग कमांड ने रितिका की उपलब्धियों को विशेष सम्मान दिया है। सेना ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर रितिका के संघर्ष, उनके शैक्षिक प्रदर्शन और राष्ट्रीय स्तर की एथलेटिक्स में उनकी भागीदारी का उल्लेख किया है। सेना ने उन्हें लक्ष्य के प्रति समर्पण और दृढ़ संकल्प का एक बेहतरीन उदाहरण बताया है।

सीमित संसाधनों में संघर्ष की कहानी रितिका का परिवार एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवेश से आता है। उनके पिता व्यवसायी हैं और मां गीता दुबे शिक्षामित्र हैं। तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी रितिका ने सीमित संसाधनों के बीच भी कभी अपने सपनों से समझौता नहीं किया। उनके भाई आर्यन दुबे एक विदेशी कंपनी में मैनेजर हैं, जबकि छोटे भाई अभी अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे हैं। पूरे परिवार के सहयोग ने रितिका की राह आसान की।

शिक्षा और खेल में बचपन से ही अव्वल रितिका की उपलब्धि रातों-रात नहीं मिली है। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव से ही पूरी की। विद्यापीठ सीतापुर से हाईस्कूल की परीक्षा में उन्होंने न केवल अच्छे अंक प्राप्त किए, बल्कि जिला स्तर पर शीर्ष स्थान हासिल किया। इंटरमीडिएट के बाद उन्होंने चेन्नई से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। बचपन से ही खेलकूद में गहरी रुचि रखने वाली रितिका ने राष्ट्रीय स्तर तक एथलेटिक्स में कई पदक अपने नाम किए हैं।

ग्रामीण प्रतिभाओं के लिए बनीं नई उम्मीद आज रितिका उन हजारों बेटियों के लिए एक आदर्श बन गई हैं जो सीमित संसाधनों के कारण अपने बड़े सपनों को पूरा करने में संशय रखती हैं। गांव के साधारण परिवेश से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक पहचान बनाने तक का उनका सफर यह साबित करता है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो कोई भी बाधा मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती। उनकी यह कामयाबी अब ग्रामीण क्षेत्र की अन्य छात्राओं के लिए एक नई उम्मीद और हौसले का प्रतीक है।

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