मनुस्मृति का विवादास्पद सच: क्या अंग्रेजों ने भारत को बांटने के लिए रची थी साजिश?
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नई दिल्ली: सनातन धर्म को लेकर अक्सर चर्चाओं में रहने वाली मनुस्मृति को लेकर अब एक बड़ा खुलासा हुआ है। बीएचयू के प्रोफेसर राकेश उपाध्याय ने इस ग्रंथ की प्रमाणिकता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने दावा किया है कि आज बाजार में उपलब्ध मनुस्मृति वह नहीं है, जिसे हमारी गुरुकुल परंपराओं या आदि शंकराचार्य ने कभी मान्यता दी थी।

गुरुकुलों में क्यों नहीं है मनुस्मृति? प्रोफेसर उपाध्याय का कहना है कि आज भी काशी में 50 से अधिक गुरुकुल हैं, लेकिन किसी भी गुरुकुल में प्रचलित मनुस्मृति की कोई प्रति नहीं है। आदि शंकराचार्य ने उपनिषदों और अन्य ग्रंथों पर भाष्य लिखे, लेकिन उन्होंने मनुस्मृति पर कोई टिप्पणी नहीं की। यदि यह ग्रंथ वास्तव में सनातन धर्म का आधार होता, तो शंकराचार्य इसे अनदेखा न करते।

ईस्ट इंडिया कंपनी और विलियम जोंस का खेल प्रोफेसर के अनुसार, वर्तमान मनुस्मृति का इतिहास भारतीय परंपरा से नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासनकाल से जुड़ा है। 1776 में एनबी हेलहेड ने पहली बार मनुस्मृति का अनुवाद करने का प्रयास किया था, जिसे बाद में खुद अंग्रेजों ने ही गड़बड़ बताकर खारिज कर दिया था। इसके बाद विलियम जोंस ने 1784 में बंगाल एशियाटिक सोसाइटी के जरिए इसे संपादित करने का काम संभाला।

कंपाइल की गई मनुस्मृति विलियम जोंस ने दावा किया था कि वह 2 करोड़ भारतीय प्रजा के लिए एक कॉमन लॉ बुक तैयार कर रहे हैं। प्रोफेसर उपाध्याय कहते हैं कि जोंस ने कोई शुद्ध अनुवाद नहीं किया, बल्कि अलग-अलग स्मृतियों और पंडितों से मिली सामग्रियों को मिलाकर एक किताब कंपाइल (संकलित) की। 1794 में कोलकाता से पब्लिश हुई यही वह प्रति है, जिसे आज विवादित रूप में पेश किया जाता है।

धर्म परिवर्तन के लिए रची गई रणनीति? प्रोफेसर राकेश उपाध्याय का मानना है कि अंग्रेजों का मुख्य उद्देश्य भारतीय समाज को विभाजित करना था। जब बाइबिल के जरिए मतांतरण में उन्हें सफलता नहीं मिली, तो उन्होंने भारतीय ग्रंथों में हेरफेर कर उन्हें ही भारत के खिलाफ उपयोग करना शुरू किया। इतिहासकारों का मानना है कि भारत में कभी भी एक कानून (मनुस्मृति) नहीं था, बल्कि 562 गणराज्यों की अपनी अलग-अलग न्याय परंपराएं थीं।

निष्कर्ष यह पूरी पड़ताल इस ओर इशारा करती है कि आज जिस मनुस्मृति को लेकर विवाद होता है, वह एक औपनिवेशिक प्रयोग (Colonial Experiment) का हिस्सा हो सकती है, जिसे भारतीय समाज में फूट डालने के उद्देश्य से अंग्रेजी शासन ने मनमाने ढंग से तैयार किया था।

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