नफरत की खेती: बलूचिस्तान और PoK की आग बुझाने के लिए पाकिस्तान सेना बांट रही इस्लाम की अफीम
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पाकिस्तान की बदहाल अर्थव्यवस्था, बलूचिस्तान में जारी विद्रोह और PoK में उबलते जन-आक्रोश को दबाने के लिए रावलपिंडी के जनरलों ने एक बार फिर अपना सबसे पुराना और घिसा-पिटा हथियार निकाला है— नफरत । सेना प्रमुख आसिम मुनीर अब पाकिस्तान की पूरी अवाम को वही जहरीली घुट्टी पिला रहे हैं, जिसे वे टू-नेशन थ्योरी और काफिर का नाम देते हैं।

मुनीर का सांप्रदायिक एजेंडा 17 अप्रैल 2025 को विदेशी पाकिस्तानियों को संबोधित करते हुए आसिम मुनीर ने बेहद भड़काऊ भाषण दिया था। उन्होंने अपने पूर्वजों का हवाला देते हुए दावा किया कि हम हिंदुओं से हर क्षेत्र में अलग और श्रेष्ठ हैं। यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सेना का वह डॉकट्रिन है, जिसे अपना वजूद बचाने के लिए बार-बार दोहराया जाता है। जनता को यह एहसास दिलाया जा रहा है कि भले ही वे भूखे मरें, लेकिन वे काफिरों से श्रेष्ठ हैं।

विफलता छिपाने का स्क्रिप्टेड ड्रामा जब भी बलूचिस्तान में सेना के खिलाफ विद्रोह तेज होता है या PoK में लोग आजादी की मांग करते हैं, तो पाकिस्तान की मीडिया विंग (DG ISPR) तुरंत सक्रिय हो जाती है। प्रेस कॉन्फ्रेंस का सहारा लेकर वे हर आंतरिक समस्या को बाहरी साजिश या काफिरों का षड्यंत्र करार देते हैं। भारत को विलेन बनाकर अपनी नाकामियों को ढकना रावलपिंडी के जनरलों की पुरानी आदत बन चुका है।

ब्रेन ड्रेन और टूटता भरोसा आज के दौर में जब दुनिया तकनीक और स्पेस इकोनॉमी की बात कर रही है, पाकिस्तान का युवा देश छोड़कर भाग रहा है। सेना इसे ब्रेन गेन का नाम देकर अपनी पीठ थपथपा रही है, जबकि हकीकत यह है कि देश में न नौकरियां हैं, न रोटी। इमरान खान के दौर के बाद सेना की मसीहा वाली छवि पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। अब जनता सेना के अरबों-खरबों के बिजनेस और राजनीति में दखल पर खुलकर सवाल पूछ रही है।

एक्सपायर हो चुका है कम्यूनल कार्ड पाकिस्तान की सेना जिस इस्लाम की अफीम का सहारा ले रही है, वह अब एक्सपायर होने की कगार पर है। डिजिटल युग में पाकिस्तान का आम नागरिक देख रहा है कि भारत आर्थिक और वैज्ञानिक मोर्चे पर कहां खड़ा है, जबकि उनका देश IMF के कर्ज और फौज की तानाशाही में पिस रहा है। रावलपिंडी के जनरलों के पास भविष्य के लिए कोई रोडमैप नहीं है। धर्म की आड़ में नफरत का यह खेल अब उन लोगों का पेट नहीं भर सकता, जो अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।

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