संसद में पेपर लीक पर चर्चा या फिर सोशल मीडिया का टूलकिट प्रदर्शन?
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संसद का मंच गंभीर चर्चाओं के लिए होता है, लेकिन आज लोकसभा में पेपर लीक जैसे संवेदनशील मुद्दे पर हो रही बहस का स्वरूप पूरी तरह बदल गया। सरकार परीक्षा प्रणाली को फूल-प्रूफ बनाने के लिए नया कानून ला रही है, जिस पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी का संबोधन सुर्खियों में है। हालांकि, सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी ने आम छात्रों का पक्ष रखा या फिर संसद को सोशल मीडिया के वॉरियर का अखाड़ा बना दिया?

संसद में सोशल मीडिया के शब्दों का इस्तेमाल

लोकसभा में राहुल गांधी ने लगभग 50 मिनट का संबोधन दिया। हैरानी की बात यह रही कि पेपर लीक जैसी गंभीर समस्या पर बात करते हुए उन्होंने अंधभक्त और आरएसएस जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। ये शब्द अक्सर सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग के लिए इस्तेमाल होते हैं। राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि आखिर एक जिम्मेदार सांसद को संसद के भीतर सोशल मीडिया की इस विभाजनकारी भाषा की क्या आवश्यकता थी?

छात्रों के मुद्दे से विषयांतर क्यों?

जंतर-मंतर पर 35 दिनों तक चले आंदोलन का केंद्र केवल पेपर लीक और छात्रों का भविष्य था। वहां किसी भी स्तर पर आरएसएस-विरोधी एजेंडा नहीं दिखा। सामान्य प्रदर्शनकारी केवल अपनी रोजी-रोटी और सिस्टम की खामियों के खिलाफ लड़ रहे थे। राहुल गांधी ने जब उस चर्चा को संसद में उठाया, तो उसे छात्रों की समस्याओं तक सीमित रखने के बजाय वैचारिक नफरत का मंच दे दिया। क्या यह छात्रों के वास्तविक संघर्ष का अपमान नहीं है?

आरएसएस का विस्तार बनाम राहुल की थ्योरी

आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले 10 वर्षों में आरएसएस का विस्तार तेजी से हुआ है। 2016 में जहां आरएसएस की 55,000 दैनिक शाखाएं थीं, वहीं 2026 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 89 हजार तक पहुंच गई। शाखाओं और साप्ताहिक मिलनों में हुई यह भारी बढ़ोतरी यह दर्शाती है कि समाज का एक बड़ा वर्ग इस संगठन की कार्यशैली से जुड़ रहा है। राहुल गांधी का अंधभक्त वाला नैरेटिव उन करोड़ों लोगों के प्रति एक बौद्धिक अभिमान को दर्शाता है, जो लोकतंत्र में अपनी पसंद की सरकार चुनने का हक रखते हैं।

क्या राहुल गांधी जेन-जी को नहीं समझ पा रहे?

आज की युवा पीढ़ी (Gen-Z) परिणाम चाहती है। वे संसद में तर्क और समाधान देखना चाहते हैं, न कि सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले जुमले। राहुल गांधी ने जिस भाषा का प्रयोग किया, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि वे संसद को संबोधित नहीं कर रहे थे, बल्कि अपने सोशल मीडिया फॉलोअर्स के लिए कंटेंट तैयार कर रहे थे।

बीजेपी का पलटवार

बीजेपी ने राहुल के इस व्यवहार को आम भारतीय मतदाताओं का अपमान करार दिया है। सत्ता पक्ष का कहना है कि जो मतदाता उन्हें पसंद नहीं करते, उन्हें अंधभक्त कहना लोकतंत्र का मजाक उड़ाना है। संसद में जिन आपत्तिजनक टिप्पणियों को कार्यवाही से हटाना पड़ा, वे इस बात का प्रमाण हैं कि राहुल गांधी ने सदन की गरिमा के बजाय अपने राजनीतिक नैरेटिव को अधिक वरीयता दी।

निष्कर्ष: पेपर लीक का मुद्दा देश के लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ा है। जब संसद में इस पर कानून बन रहा है, तब इस तरह के अनावश्यक विवादों से चर्चा का मुख्य उद्देश्य भटक जाता है। क्या राहुल गांधी का लक्ष्य वास्तव में छात्रों का भला करना है या सिर्फ सोशल मीडिया पर शोर मचाना? यह सवाल आज देश का हर जागरूक नागरिक पूछ रहा है।

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