छत की क्रिकेट से टीम इंडिया तक: सारांश जैन का अनसुना सफर
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भारतीय क्रिकेट टीम में जगह बनाना किसी भी खिलाड़ी का सपना होता है, लेकिन मध्य प्रदेश के ऑलराउंडर सारांश जैन की कहानी थोड़ी अलग है। उनका सफर किसी महंगी अकादमी से नहीं, बल्कि इंदौर स्थित उनके घर की छत से शुरू हुआ था।

पिता बने पहले कोच सारांश के पिता और पूर्व रणजी क्रिकेटर सुबोध जैन ने ही उनकी नींव रखी। खाली समय में घर की छत पर नेट लगाकर पिता ने उन्हें घंटों अभ्यास कराया। सारांश की मां संगीता जैन बताती हैं कि घंटों की प्रैक्टिस में कई बार सारांश के हाथों में चोट लगी, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और पट्टी बांधकर फिर अभ्यास में जुट गए।

पड़ोसियों के टूटे शीशे और आज का गर्व अभ्यास के दौरान सारांश के घातक शॉट्स से अक्सर पड़ोसियों की खिड़कियों के शीशे टूट जाते थे। सुबोध जैन तब पड़ोसियों से कहते थे, आज मैं शीशा लगवा रहा हूँ, लेकिन एक दिन यही पड़ोसी इस बच्चे पर गर्व करेंगे। आज उनकी वह भविष्यवाणी सच साबित हो गई है।

बदली बल्लेबाजी की शैली सारांश का आज का लेफ्टी बल्लेबाज वाला स्टाइल उनके पिता की देन है। सारांश के बड़े भाई सौरभ के अनुसार, बचपन में सारांश भी दाएं हाथ से बल्लेबाजी करते थे। लेकिन उनके पिता ने उनकी प्रतिभा को भांप लिया और उन्हें बाएं हाथ से बल्लेबाजी करने की सलाह दी। यह फैसला उनके करियर का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

मेहनत से बनी पहचान आज के दौर में कई खिलाड़ी आईपीएल के प्रदर्शन के बल पर टीम में आते हैं, लेकिन सारांश का चयन उनकी शुद्ध मेहनत का परिणाम है। रणजी ट्रॉफी में मध्य प्रदेश को चैंपियन बनाने में उनकी अहम भूमिका रही। दलीप ट्रॉफी में 16 विकेट और ईरानी कप में शानदार प्रदर्शन ने चयनकर्ताओं को उन्हें टीम में शामिल करने पर मजबूर कर दिया।

सफेद जर्सी का सपना अगले महीने श्रीलंका दौरे पर सारांश पहली बार भारतीय टेस्ट टीम की सफेद जर्सी में नजर आ सकते हैं। छत पर शुरू हुए उनके सपने अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर दस्तक देने को तैयार हैं। परिवार को पूरा भरोसा है कि जिस तरह उन्होंने घरेलू क्रिकेट में लोहा मनवाया है, उसी तरह वे भारतीय टीम के लिए भी एक बड़े मैच विनर साबित होंगे।

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