कश्मीर पर सलेक्टिव प्रोपेगेंडा का DNA टेस्ट: दुनिया को भारत क्यों दिखता है, PoK क्यों नहीं?
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अंतरराष्ट्रीय एजेंडे की सच्चाई आजकल अंतरराष्ट्रीय मीडिया का एक वर्ग वैचारिक मोतियाबिंद का शिकार हो गया है। इन तथाकथित पत्रकारों को भारत के कश्मीर में सुरक्षाबलों द्वारा आतंकियों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई तो मानवाधिकारों का उल्लंघन दिखाई देती है, लेकिन पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में पाकिस्तानी सेना द्वारा बेगुनाह नागरिकों की हत्या और बर्बरता इन्हें नजर नहीं आती।

TRT वर्ल्ड की खास रिपोर्टिंग का सच तुर्किए की सरकारी मीडिया एजेंसी TRT वर्ल्ड का एजेंडा जगजाहिर है। राष्ट्रपति एर्दोआन के इस्लामिक खलीफा बनने के सपनों को आगे बढ़ाने वाली यह संस्था भारतीय सुरक्षाबलों को बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोड़ती। अनंतनाग में पुलिसकर्मी आशिक हुसैन कुरैशी की कायराना हत्या के बाद सुरक्षाबलों ने जब आतंकियों के मददगारों (ओवर ग्राउंड वर्कर्स) के खिलाफ कार्रवाई की, तो TRT वर्ल्ड ने इसे आम जनता पर जुल्म बताकर पेश किया।

आतंकियों के प्रति हमदर्दी क्यों? हकीकत यह है कि जम्मू-कश्मीर में 3,500 से ज्यादा संदिग्धों को हिरासत में लेना सुरक्षा की दृष्टि से अनिवार्य था। ये वे लोग हैं जो आतंकियों को पनाह, भोजन और रसद मुहैया कराते हैं। TRT वर्ल्ड ने उस शहीद पुलिसकर्मी की हत्या की निंदा करने के बजाय, आतंकियों के मददगारों पर हुई कार्रवाई को मुद्दा बनाया। यह उनकी वैचारिक बेईमानी का सबसे बड़ा सबूत है।

PoK में खून-खराबे पर चुप्पी क्यों? अनंतनाग से कुछ किलोमीटर दूर स्थित PoK में पाकिस्तानी सेना मुनीर की फौज आम नागरिकों पर गोलियां बरसा रही है। वहां चुनाव में धांधली का विरोध करने वाले 19 से ज्यादा बेगुनाह कश्मीरी मारे जा चुके हैं। वहां की ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी लगातार मदद की गुहार लगा रही है, लेकिन तुर्किए या पश्चिमी देशों के मानवाधिकार चैंपियन वहां पूरी तरह खामोश हैं।

कहां हैं अभिव्यक्ति की आजादी के ठेकेदार? नॉर्वे की पत्रकार हेले लेंग जैसी हस्तियां, जो दुनिया भर में अभिव्यक्ति की आजादी का दम भरती हैं, PoK के अत्याचार पर मौन साधे हुए हैं। यह सलेक्टिव चुप्पी साबित करती है कि यह कोई पत्रकारिता नहीं, बल्कि भारत विरोधी नैरेटिव फैलाने का एक सुनियोजित षड्यंत्र है।

आखिर यह भेदभाव कब तक? सवाल यह है कि जो मीडिया संस्थान कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था के लिए उठाए गए कदमों को भय का माहौल कहते हैं, वे PoK में हो रहे जनसंहार पर ध्यान मुद्रा में क्यों चले जाते हैं? यह साफ है कि इनका मकसद मानवाधिकार की रक्षा नहीं, बल्कि भारत की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूमिल करना है। सच यह है कि भारत का कश्मीर इनके एजेंडे में है, लेकिन PoK का दर्द इनकी सुविधा की राजनीति में कहीं फिट नहीं बैठता।

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