पीओके में खूनी संघर्ष: रावलाकोट में सुरक्षा बलों की फायरिंग से 14 लोगों की मौत, इंटरनेट सेवाएं ठप
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पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में स्थिति लगातार विस्फोटक बनी हुई है। रावलाकोट में प्रदर्शनकारियों पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा की गई कथित फायरिंग में 14 लोगों की जान जाने की खबर है। इस बर्बर कार्रवाई के बाद पूरे इलाके में तनाव चरम पर है।

हिंसा और दमन का दौर सोमवार को रावलाकोट के ईदगाह इलाके में उस समय भारी बवाल हो गया, जब स्थानीय लोग विधानसभा चुनावों का बहिष्कार कर प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पाकिस्तानी सेना, पंजाब रेंजर्स और स्थानीय पुलिस ने निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाईं और आंसू गैस के गोले दागे। इस कार्रवाई में 14 युवाओं की मौत हो गई और सैकड़ों लोग घायल बताए जा रहे हैं।

इंटरनेट और बिजली सेवा पर कैंची जमीनी हकीकत को छिपाने के लिए प्रशासन ने दमनकारी कदम उठाए हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, सरकार ने मोबाइल सेवाओं को बंद कर दिया है, साथ ही इंटरनेट कनेक्टिविटी और बिजली की आपूर्ति भी ठप कर दी गई है। पूरे क्षेत्र में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है और बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

क्या है जेएएसी की मांग? पीओके में लंबे समय से जम्मू-कश्मीर संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रही है। यह संगठन 1947 के बाद बाहर से आए लोगों के लिए आरक्षित विधानसभा की 12 सीटों को खत्म करने और कश्मीरी जनता को अधिक राजनीतिक अधिकार देने की मांग कर रहा है। जेएएसी ने ऐलान किया है कि सेना की गोलियां भी उनके हौसले को नहीं तोड़ सकतीं और आंदोलन जारी रहेगा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध की अपील जेएएसी के वरिष्ठ सदस्य इम्तियाज असलम ने इस कार्रवाई को आतंकवाद करार दिया है। उन्होंने विदेशों में रह रहे कश्मीरियों से अपील की है कि वे दुनिया भर में पाकिस्तानी दूतावासों, मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र के बाहर विरोध प्रदर्शन करें। उन्होंने कहा कि बेगुनाह युवाओं की हत्या का बदला न्याय के जरिए लिया जाएगा।

राजनीतिक घेरे में शहबाज सरकार पीओके में हुई इस हिंसा ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। विपक्षी नेता और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (एफ) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने इस गोलीबारी की कड़ी निंदा की है। उन्होंने इसे खुला आतंकवाद बताते हुए कहा कि सरकार मसले को सुलझाने में पूरी तरह विफल रही है और उनकी पार्टी पीओके के लोगों के साथ खड़ी है।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर पीओके में पाकिस्तान के नियंत्रण और वहां की मानवाधिकार स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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