CWG 2026: सबसे बड़ी उम्मीद गुरिंदरवीर सिंह क्वालिफिकेशन से ही बाहर, क्यों टूटा करोड़ों का सपना?
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ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के स्टार फर्राटा धावक गुरिंदरवीर सिंह से देश को बड़े पदकों की उम्मीद थी। महज दो महीने पहले रांची में 10.09 सेकेंड का नेशनल रिकॉर्ड बनाकर इतिहास रचने वाले गुरिंदरवीर का प्रदर्शन सोमवार को निराशाजनक रहा। वे 100 मीटर स्पर्धा के क्वालिफिकेशन राउंड से ही बाहर हो गए।

गुरिंदरवीर ने अपनी हीट में दूसरा स्थान हासिल किया, लेकिन कुल समय के आधार पर वे 28वें स्थान पर रहे। आइए जानते हैं वे 4 बड़े कारण, जिन्होंने भारतीय एथलीट के सफर को यहीं खत्म कर दिया।

1. नया और कठिन क्वालिफिकेशन फॉर्मेट

ग्लास्गो में नियमों ने एथलीटों के लिए चुनौती बढ़ा दी थी। प्रतियोगिता में 11 हीट में कुल 76 धावक थे। नियम यह था कि हीट में अपनी पोजीशन मायने नहीं रखती, बल्कि कुल 76 धावकों में से सबसे तेज समय निकालने वाले केवल 17 एथलीट ही सेमीफाइनल में जाएंगे। गुरिंदरवीर अपनी हीट में दूसरे नंबर पर रहे, लेकिन उनकी टाइमिंग 10.39 सेकेंड रही, जो सेमीफाइनल के लिए जरूरी 10.24 सेकेंड के कट-ऑफ से काफी पीछे थी।

2. हवा का फायदा न उठा पाना

रेस के दौरान 1.5 मीटर/सेकंड की रफ्तार से अनुकूल हवा (tail-wind) चल रही थी, जो धावकों की गति बढ़ाने में मदद करती है। दुनिया भर के एथलीट इस प्राकृतिक मदद से अपनी टाइमिंग बेहतर करते हैं। गुरिंदरवीर इस अनुकूल परिस्थिति का फायदा उठाने में पूरी तरह नाकाम रहे और अपने ही नेशनल रिकॉर्ड (10.09s) के आसपास भी नहीं पहुंच सके।

3. अंतरराष्ट्रीय दबाव और अनुभव की कमी

कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे वैश्विक मंच पर यह गुरिंदरवीर का पहला बड़ा अनुभव था। जमैका के रोहन वॉटसन जैसे विश्व स्तरीय धावकों के बीच दौड़ना मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है। खेल जानकारों का मानना है कि बड़े मंच का दबाव और अपेक्षाओं का बोझ गुरिंदरवीर के प्रदर्शन पर हावी रहा, जिससे वे अपनी स्वाभाविक लय खो बैठे।

4. फिनिशिंग और स्ट्राइड में तकनीकी कमी

वीडियो विश्लेषण में स्पष्ट दिखा कि गुरिंदरवीर ने शुरुआती 40 मीटर तक जबरदस्त रफ्तार पकड़ी थी, लेकिन अंतिम 40 मीटर में उनकी गति गिर गई। दौड़ के आखिरी हिस्से में उनके स्ट्राइड फ्रीक्वेंसी (कदमों की आवृत्ति) में कमी दिखी। रेस के अंतिम क्षणों में उनकी यह सुस्ती ही उनके सेमीफाइनल में पहुंचने के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बनी।

ग्लास्गो का यह सफर गुरिंदरवीर के लिए एक बड़ा सबक बनकर आया है। अब भारतीय एथलेटिक्स का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वे अपनी इस तकनीकी और मानसिक कमजोरी को कैसे दूर करते हैं।

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