जीत के जश्न में अदृश्य क्यों हुए सोनम वांगचुक? अभिजीत दीपके के भाषण ने छेड़ी नई बहस
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जंतर-मंतर पर जीत का ऐलान धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद 25 जुलाई को जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने अपनी जीत का आधिकारिक ऐलान किया। मंच से पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने इसे लोकतंत्र की जीत करार दिया। उन्होंने समर्थकों से अपील की कि वे किसी एक व्यक्ति को हीरो न बनाएं, लेकिन उनके पूरे संबोधन में एक नाम की कमी खली, जिसने लोगों का ध्यान खींचा।

वांगचुक का नाम गायब क्यों? जिस सोनम वांगचुक की 26 दिनों की लंबी भूख हड़ताल ने एक छोटे से धरने को राष्ट्रीय स्तर के आंदोलन में तब्दील कर दिया था, उनका नाम जीत के इस मंच से पूरी तरह नदारद रहा। सोशल मीडिया पर अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या CJP इस ऐतिहासिक जीत के क्रेडिट से वांगचुक को जानबूझकर दूर रखना चाहती है?

किसी को हीरो मत बनाओ मंच से अभिजीत दीपके ने स्पष्ट शब्दों में कहा, मैं बहुत पते की बात कहना चाहता हूँ। धर्मेंद्र प्रधान के हटने पर मुझे हीरो मत बनाइए। यह गलती मत कीजिएगा। देश का नुकसान इसीलिए हुआ है क्योंकि हम किसी एक इंसान को हीरो बना देते हैं। उन्होंने आगे कहा कि यह इस्तीफा सरकार के झुकने का सबूत है, लेकिन इस दौरान उन्होंने वांगचुक के योगदान का उल्लेख करना जरूरी नहीं समझा।

आंदोलन में वांगचुक का बड़ा योगदान 6 जून को शुरू हुए इस धरने को तब तक सीमित पहचान मिली थी, जब तक सोनम वांगचुक ने 28 जून से अनशन शुरू नहीं किया। उनकी गिरती सेहत और 18 जुलाई को पुलिस द्वारा जबरन अस्पताल ले जाने की घटना ने आंदोलन में नई जान फूंक दी। देखते ही देखते यह प्रदर्शन युवाओं और छात्रों का एक विशाल जन-आंदोलन बन गया।

क्या वांगचुक का अनशन तोड़ना बना कारण? सोशल मीडिया के एक वर्ग का मानना है कि वांगचुक की ओर से सरकार के मंत्रियों के भरोसे पर अनशन तोड़ने के फैसले के बाद से CJP के साथ उनके वैचारिक मतभेद उभरे हैं। आलोचकों ने वांगचुक पर बिना इस्तीफा लिए अनशन तोड़ने का आरोप लगाया था, हालांकि उनकी पत्नी गीतांजलि अंगमो ने इन आरोपों को खारिज करते हुए उनके त्याग का समर्थन किया था।

आंदोलन अब किसी एक चेहरे का मोहताज नहीं विवादों के बीच CJP के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने स्पष्ट किया था कि यह लड़ाई अब किसी एक चेहरे की नहीं, बल्कि देश की जनता की है। उन्होंने कहा कि आंदोलन CJP और वांगचुक दोनों से बड़ा हो चुका है। बहरहाल, धरातल पर यह सच है कि इस लोकतंत्र की जीत की नींव सोनम वांगचुक के 26 दिनों के तप से ही रखी गई थी, जिसे नजरअंदाज करना कई सवाल पैदा कर रहा है।

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