संघर्षों को पछाड़कर गूंजा बिहार का नाम: कॉमनवेल्थ गेम्स में पैरा-पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने जीता कांस्य
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ग्लासगो: कॉमनवेल्थ गेम्स के मंच पर भारत के पैरा-पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने इतिहास रच दिया है। उन्होंने भारी वजन वर्ग (हेवीवेट कैटेगरी) में कांस्य पदक जीत न केवल देश का मान बढ़ाया है, बल्कि अपनी मेहनत से सफलता की एक नई मिसाल पेश की है।

मानो हवा में उड़ रहा हूं पदक जीतने के बाद झंडू कुमार बेहद भावुक नजर आए। अपनी खुशी जाहिर करते हुए उन्होंने कहा, मुझे ऐसा महसूस हो रहा है जैसे मैं हवा में उड़ रहा हूं। यह मेरे करियर का पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय पदक है। मुकाबले के दौरान मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही लक्ष्य था—हर हाल में जीत हासिल करना।

सब्जी बेचने से पोडियम तक का सफर झंडू कुमार की सफलता की कहानी प्रेरणा से भरी है। बिहार के एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले झंडू के पिता सब्जी विक्रेता हैं। तंगहाली के दिनों में उन्होंने खुद भी सब्जियां बेचीं और परिवार का पेट भरने के लिए ई-रिक्शा तक चलाया। अभावों के बावजूद खेल के प्रति उनकी दीवानगी कभी कम नहीं हुई।

दमदार प्रदर्शन कॉमनवेल्थ गेम्स के इस मुकाबले में झंडू ने अपनी ताकत का लोहा मनवाया। उन्होंने 181 और 190 किलोग्राम के सफल लिफ्ट लगाए और कुल 130.9 अंक हासिल किए। हालांकि, उनका 196 किलोग्राम का अंतिम प्रयास सफल नहीं हो सका, लेकिन उनकी शुरुआती मेहनत उन्हें पदक दिलाने के लिए काफी साबित हुई।

परिवार और कोच को समर्पित जीत झंडू ने अपनी इस ऐतिहासिक जीत का श्रेय अपने परिवार, कोच और सपोर्ट स्टाफ को दिया है। उन्होंने कहा, मैं उन सभी लोगों का आभारी हूं जिन्होंने मुझ पर विश्वास बनाए रखा। मेरे कोचों ने मुझे बेहतर करने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया। यह पदक सिर्फ मेरा नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की मेहनत का परिणाम है जिन्होंने इस सफर में मेरा साथ दिया।

भविष्य की ओर नजरें इस जीत ने झंडू कुमार के हौसलों को और बुलंद कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यह बस शुरुआत है। आने वाले समय में वे और अधिक कड़ी मेहनत करेंगे ताकि देश को इससे भी बेहतर परिणाम दे सकें। झंडू की यह उपलब्धि साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो गरीबी और चुनौतियां भी सफलता के रास्ते में बाधा नहीं बन सकतीं।

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