CWG 2026: सब्जी बेचने और ई-रिक्शा चलाने वाले झंडू कुमार ने रचा इतिहास, भारत को दिलाया पहला मेडल
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ग्लासगो: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का पदक खाता खुल गया है। बिहार के लाल और पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने पुरुषों की हेवीवेट कैटेगरी में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर देश का मान बढ़ाया है। 130.9 पॉइंट्स के साथ उन्होंने यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है।

शुरुआती झटकों के बाद मिली कामयाबी कॉमनवेल्थ गेम्स के पहले दिन भारतीय एथलीटों के लिए पावरलिफ्टिंग में शुरुआत कुछ खास नहीं रही थी। लेकिन दिन के अंतिम मुकाबले में जब झंडू कुमार ने मंच संभाला, तो उम्मीदें जाग उठीं। उन्होंने अपने दूसरे प्रयास में 190 किलोग्राम वजन उठाकर 130.9 पॉइंट्स हासिल किए और भारत के लिए पदक पक्का कर दिया।

गोल्ड से मामूली अंतर से चूके झंडू का मुकाबला बेहद कड़ा था। नाइजीरिया के रिलुवान इदरीस ने गोल्ड और इंग्लैंड के मैथ्यू हार्डिंग ने सिल्वर मेडल जीता। झंडू तीसरे स्थान पर रहे। यदि वे अपने तीसरे प्रयास में 196 किलोग्राम वजन उठाने में सफल हो जाते, तो पदक का रंग गोल्ड या सिल्वर हो सकता था। बावजूद इसके, अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनका यह प्रदर्शन सराहनीय रहा।

पोलियो से लेकर संघर्षों तक का सफर पांच साल की उम्र में पोलियो के कारण अपने दोनों पैर गंवा देने वाले झंडू के लिए यह सफर आसान नहीं था। बिहार के नालंदा जिले के रहने वाले झंडू ने गरीबी और दिव्यांगता को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। परिवार का पेट पालने के लिए कभी उन्होंने सब्जियां बेचीं, तो कभी ई-रिक्शा चलाया।

नेशनल गेम्स के लिए बेच दिया ई-रिक्शा झंडू के जुनून की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है। एक समय ऐसा भी आया जब उनके पास नेशनल गेम्स में भाग लेने के लिए पैसे नहीं थे। तब उन्होंने अपना ई-रिक्शा बेचकर प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था। एक खेल अधिकारी की सलाह पर पावरलिफ्टिंग अपनाने वाले झंडू आज करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन गए हैं।

उनकी यह ऐतिहासिक जीत साबित करती है कि अगर जज्बा अटूट हो, तो गरीबी और शारीरिक चुनौतियां भी सफलता के आड़े नहीं आ सकतीं।

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