सब्जी बेचने से पोडियम तक: बिहार के झंडू कुमार ने कॉमनवेल्थ गेम्स में रचा इतिहास
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बिहार के नालंदा के रहने वाले झंडू कुमार ने वह कर दिखाया है, जो लाखों लोगों के लिए एक मिसाल बन गया है। कॉमनवेल्थ गेम्स में पैरा-पावरलिफ्टिंग के जरिए उन्होंने न केवल पदक जीता, बल्कि अपने संघर्षों की कहानी से पूरे देश का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया है।

गरीबी और संघर्ष को दी मात झंडू का जीवन आसान नहीं था। एक गरीब परिवार में पले-बढ़े झंडू ने कोरोना महामारी के दौरान पेट पालने के लिए सड़कों पर सब्जियां बेचीं और ई-रिक्शा तक चलाया। उनके माता-पिता आज भी सब्जी बेचने का काम करते हैं। इन कठिन परिस्थितियों में भी झंडू ने अपने खेल के प्रति जुनून को कम नहीं होने दिया।

पोलियो को बनाया अपनी ताकत महज पांच साल की उम्र में पोलियो के कारण झंडू के पैरों ने उनका साथ छोड़ दिया था। शारीरिक चुनौती ने उनकी राह मुश्किल जरूर की, लेकिन उनके इरादों को नहीं डगमगाया। पैरा-पावरलिफ्टिंग में कदम रखते ही मानो उन्हें अपनी मंजिल मिल गई। आज वे न केवल राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक हैं, बल्कि देश के बेहतरीन पैरा-एथलीटों की सूची में शामिल हो चुके हैं।

ग्लासगो में लहराया परचम स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स में झंडू कुमार ने इतिहास रच दिया। उन्होंने पुरुषों के हैवीवेट पैरा-पावरलिफ्टिंग वर्ग में 130.9 किग्रा वजन उठाकर ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। यह उनके करियर का पहला अंतरराष्ट्रीय पदक है, जिसने उन्हें वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई है।

ऐसा लग रहा है जैसे मैं हवा में उड़ रहा हूं पदक जीतने के बाद झंडू की खुशी का ठिकाना नहीं था। उन्होंने अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहा, मैं आज बहुत गर्व महसूस कर रहा हूं। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं हवा में उड़ रहा हूं। मेरा एकमात्र लक्ष्य पदक जीतना था और मैंने उसे हासिल कर लिया।

भविष्य की ओर बढ़ते कदम झंडू ने इस प्रतियोगिता में 181 किग्रा और 190 किग्रा की लिफ्ट सफलतापूर्वक पूरी की। हालांकि 196 किग्रा का प्रयास सफल नहीं रहा, लेकिन उनका जज्बा बरकरार रहा। नाइजीरिया और इंग्लैंड के एथलीटों के साथ पोडियम साझा करते हुए झंडू ने साबित कर दिया कि हौसले की उड़ान के सामने गरीबी और शारीरिक अक्षमता जैसी बाधाएं छोटी पड़ जाती हैं।

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