दतिया उपचुनाव: नरोत्तम मिश्रा को टिकट न देने के पीछे छिपी बीजेपी की बड़ी राजनीतिक रणनीति
News Image

मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी के पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट न मिलना केवल एक चुनावी फैसला नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति में सत्ता और संगठन के बदलते समीकरणों का संकेत है। इस निर्णय के बाद भड़की हिंसा और पुलिस बल की तैनाती ने यह साफ कर दिया है कि मिश्रा का प्रभाव अभी भी दतिया में गहरा है।

टिकट कटने के बाद दतिया में हिंसा शुक्रवार शाम जैसे ही आशुतोष तिवारी को टिकट मिलने की खबर आई, नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। शनिवार सुबह तक यह विरोध हिंसक हो गया, जिसमें आठ पुलिसकर्मी समेत कई लोग घायल हुए। स्थिति को काबू में करने के लिए पूरे जिले में धारा 163 लागू कर दी गई। वहीं, नरोत्तम मिश्रा ने खुद आगे आकर समर्थकों से हिंसा न करने और पार्टी लाइन का पालन करने की अपील की।

क्या नरोत्तम मिश्रा से पावर सेंटर का डर था? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी नेतृत्व नहीं चाहता था कि चुनाव जीतकर मिश्रा फिर से विधानसभा पहुंचें। एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, मिश्रा की वापसी से राज्य में एक और मजबूत पावर सेंटर बन जाता, जो मौजूदा मुख्यमंत्री मोहन यादव की पकड़ के लिए चुनौती बन सकता था। संगठन ने व्यक्तिगत कद के बजाय संगठनात्मक निष्ठा को प्राथमिकता दी है।

बदलती राजनीति: संगठन और आरएसएस का प्रभाव वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि बीजेपी में अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की भूमिका पहले से कहीं अधिक प्रभावी हो गई है। हाल के दिनों में शिवराज सिंह चौहान, गोपाल भार्गव और कैलाश विजयवर्गीय जैसे दिग्गजों के सामने पैदा हुई चुनौतियों के पीछे भी यही बदलाव देखा जा रहा है। पार्टी अब पुराने रौब वाली राजनीति के बजाय संगठन के प्रति पूर्ण समर्पित और सुचिता वाला नया चेहरा गढ़ना चाहती है।

चुनावी गणित और भविष्य की चुनौतियां भले ही पार्टी ने आशुतोष तिवारी को खड़ा किया है, लेकिन दतिया में जातीय समीकरण बेहद जटिल हैं। अनुसूचित जाति (करीब 60 हजार), ब्राह्मण (35 हजार) और कुशवाह समाज के मतदाता यहां निर्णायक भूमिका में हैं। आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव की उम्मीदवारी से कांग्रेस और बीजेपी दोनों के वोट बैंक में सेंध लगने की संभावना है।

बीजेपी ने दतिया में कुशवाह समाज को साधने के लिए पहले ही संगठनात्मक बदलाव कर दिए हैं। अब 30 जुलाई को होने वाला मतदान यह तय करेगा कि क्या बीजेपी का यह दांव—पुराने दिग्गज को दरकिनार कर नए चेहरे को मौका देना—सफल होता है या नहीं। यह चुनाव अब केवल एक सीट नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश में बीजेपी के भीतर के नए पावर गेम का अग्निपरीक्षा बन चुका है।

*

कुछ अन्य वेब स्टोरीज

Story 1

आमिर खान की तीसरी शादी पर बवाल, बजरंग दल ने लगाए लव जिहाद के गंभीर आरोप

Story 1

तिरंगे से जगमगाया न्यूजीलैंड का स्काई टावर: पीएम मोदी के स्वागत में दिखा अद्भुत नजारा

Story 1

बांकीपुर उपचुनाव: BJP प्रत्याशी के मैदान छोड़ने पर प्रशांत किशोर का तंज, बोले- डर के मारे भाग रहे उम्मीदवार

Story 1

नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटा या काटा गया? एमपी की सियासत में छिपे ‘बड़े खेल’ की इनसाइड स्टोरी

Story 1

फीफा वर्ल्ड कप 2026: सुपर सब मिकेल मेरिनो का करिश्मा, स्पेन सेमीफाइनल में

Story 1

पंजाब कांग्रेस में घमासान: चन्नी-रंधावा की दो टूक, क्या आलाकमान सुलझा पाएगा कलह?

Story 1

विंबलडन के रॉयल बॉक्स में शुभमन गिल का जलवा, बने यह खास उपलब्धि हासिल करने वाले चौथे भारतीय कप्तान

Story 1

भारत-न्यूजीलैंड की नई रणनीतिक साझेदारी : रोडमैप 2030 से बदलेगी व्यापार और रक्षा की तस्वीर

Story 1

लॉर्ड्स टेस्ट: क्रांति गौड़ की घातक गेंदबाजी ने इंग्लैंड को बैकफुट पर धकेला

Story 1

स्पेन के जंगलों में मौत का तांडव : भीषण आग से 12 की मौत, 23 लोग लापता