अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट में वित्तीय अनियमितताओं और चढ़ावे की चोरी के मामले ने अब एक नया और गंभीर मोड़ ले लिया है। ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने सीधे तौर पर ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों की शक्तियों पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
साधु-संत महज दिखावा? शंकराचार्य का आरोप है कि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में शामिल संतों को केवल शो-पीस (दिखावे) के तौर पर रखा गया था। उनका दावा है कि ट्रस्ट की पहली बैठक में ही अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास से हस्ताक्षर करने का अधिकार छीन लिया गया था। यह अधिकार उनके किसी विश्वस्त व्यक्ति को दे दिया गया था, जिससे साफ होता है कि ट्रस्ट चलाने की वास्तविक शक्तियां कुछ गिने-चुने लोगों के पास ही थीं।
कोषाध्यक्ष के पास नहीं थे अधिकार विवाद तब और गहरा गया जब कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी महाराज ने खुद स्वीकार किया कि उनके पास कोषाध्यक्ष के रूप में चेक पर हस्ताक्षर करने का कोई अधिकार नहीं था। शंकराचार्य ने इस खुलासे पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब अध्यक्ष और कोषाध्यक्ष दोनों ही नाम मात्र के हैं, तो ट्रस्ट में पारदर्शिता की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
पीएम मोदी और सीएम योगी पर साधा निशाना शंकराचार्य ने इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार को सीधे घेरा है। उन्होंने कहा कि डबल इंजन की सरकार के नाक के नीचे यह सब हो रहा है, तो इसकी जिम्मेदारी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बच नहीं सकते। उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि यदि राम भक्तों पर गोली चलने के लिए मुलायम सिंह यादव जिम्मेदार थे, तो राम मंदिर ट्रस्ट में हुई चोरी के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जवाबदेह क्यों नहीं?
धार्मिक आस्था का गलत इस्तेमाल स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोप लगाया कि राम मंदिर जैसे आस्था के केंद्र का इस्तेमाल स्वार्थ के लिए किया गया। उन्होंने कहा कि यदि ट्रस्ट की व्यवस्था में संतों को वास्तव में प्रभावी भूमिका और निर्णय लेने की वास्तविक शक्तियां दी जातीं, तो आज ऐसी चिंताजनक स्थिति पैदा नहीं होती।
बढ़ रहा ट्रस्ट पर दबाव कोषाध्यक्ष द्वारा यह स्वीकार करना कि उन्हें मंदिर के खातों की जानकारी हाल ही में मिली है, ट्रस्ट की प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करता है। करोड़ों श्रद्धालुओं का दान और आस्था इस मंदिर से जुड़ी है, ऐसे में वित्तीय पारदर्शिता को लेकर मची यह खलबली ट्रस्ट के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। फिलहाल, सभी की निगाहें एसआईटी जांच और आगे होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं।
*धर्मस्थान को स्वार्थ के लिए प्रयोग किया आप लोगों ने।
— Hem Raaj Verma (@hemrajvermapbt) July 7, 2026
ट्रस्ट में डाले गए साधु-संत केवल दिखावा थे,
वास्तव में उनको भी कोई अधिकार नहीं दिये गये थे।
सारे अधिकार अपने विश्वस्तों को दिये गये थे।
**जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज जी..! pic.twitter.com/oLXbcDvD43
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