भारत-जापान की भाई-बहन कूटनीति: चीन और अमेरिका के लिए क्यों बना खतरे का संकेत?
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नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची की दिल्ली में हुई मुलाकात ने कूटनीति की परिभाषा बदल दी है। पीएम मोदी द्वारा ताकाइची को छोटी बहन कहकर संबोधित करना महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक गहरे पारिवारिक और रणनीतिक गठबंधन की शुरुआत है।

रक्षा क्षेत्र में ऐतिहासिक बदलाव इस दौरे पर भारत और जापान ने रक्षा क्षेत्र में एक बड़ी लकीर खींची है। जापान, जो आमतौर पर अपनी संवेदनशील सैन्य तकनीक साझा करने से बचता है, उसने भारत के साथ एडवांस्ड रडार सिस्टम, नौसेना संचार प्रणाली और अंडर-वॉटर ड्रोन बनाने का समझौता किया है। यह मेक इन इंडिया के लिए एक बड़ा गेम चेंजर साबित होगा।

सेमीकंडक्टर और ग्रीन एनर्जी में साझेदारी चीन के वैश्विक सप्लाई चेन पर एकाधिकार को चुनौती देने के लिए दोनों देशों ने सेमीकंडक्टर रेजिलिएंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत जापानी कंपनियां भारत में चिप डिजाइनिंग और एआई रिसर्च सेंटर स्थापित करेंगी। साथ ही, ग्रीन हाइड्रोजन और अमोनिया के संयुक्त उत्पादन पर भी मुहर लगाई गई है, जो दोनों देशों को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाएगा।

क्यों परेशान हैं चीन और अमेरिका? जापान की प्रधानमंत्री ताकाइची को ‘आयरन लेडी’ कहा जाता है और वह चीन की विस्तारवादी नीतियों की मुखर विरोधी हैं। उनका यह झुकाव और पीएम मोदी के साथ रक्षा व आर्थिक मजबूती, बीजिंग के लिए रेड अलार्म की तरह है। वहीं, दोनों देशों के बीच डॉलर के बिना रुपया-येन में सीधे व्यापार करने की योजना अमेरिका के लिए बड़ी चिंता का विषय है। यदि डॉलर का मोहताज व्यापार खत्म होता है, तो वैश्विक मुद्रा बाजार पर अमेरिका का प्रभाव कम हो सकता है।

इतिहास से वर्तमान तक का अटूट रिश्ता भारत और जापान के संबंध केवल राजनीति पर आधारित नहीं हैं। 8वीं सदी में बौद्ध भिक्षु बोधिसेन के जापान जाने से शुरू हुई यह यात्रा आज आधुनिक युग में स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप तक पहुँच गई है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जस्टिस राधाबिनोद पाल की भूमिका हो या नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज को जापान का समर्थन—इतिहास गवाह है कि दोनों देशों ने सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ दिया है।

निष्कर्ष पीएम मोदी और सनाए ताकाइची की इस मुलाकात ने स्पष्ट कर दिया है कि एशिया की दो सबसे बड़ी लोकतांत्रिक ताकतें अब एक नए अध्याय में प्रवेश कर चुकी हैं। यह रिश्ता न केवल सुरक्षा और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह एशिया के भविष्य का शक्ति संतुलन बदलने की क्षमता भी रखता है।

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