ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने वाले भारतीय प्रतिनिधिमंडल को लेकर सोशल मीडिया पर एक विवाद खड़ा किया गया है। पीएम मोदी के इस कार्यक्रम में न जाने को लेकर कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं, लेकिन कूटनीति के जानकारों का मानना है कि यह फैसला पूरी तरह राष्ट्रहित और व्यावहारिक संबंधों से प्रेरित है।
भारत ने इस कार्यक्रम के लिए एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजा है। इसमें बिहार के राज्यपाल और पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन तथा विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा शामिल हैं। सैयद अता हसनैन का शिया समुदाय से जुड़ाव और उनका सैन्य बैकग्राउंड ईरान के साथ हमारे गहरे सांस्कृतिक और कूटनीतिक रिश्तों को दर्शाता है, जो एक बेहद सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।
जो लोग पीएम मोदी की अनुपस्थिति पर सवाल उठा रहे हैं, वे उनके पूर्व-निर्धारित अंतरराष्ट्रीय दौरे को नजरअंदाज कर रहे हैं। 6 से 11 जुलाई के बीच प्रधानमंत्री का इंडोनेशिया, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया का दौरा पहले से तय है। कूटनीति भावनाओं के बजाय राष्ट्रहित और प्राथमिकताओं से चलती है, और प्रधानमंत्री का शेड्यूल पहले से ही व्यस्त है।
हैरानी की बात यह है कि जो देश ईरान के सबसे करीबी माने जाते हैं, वहां के राष्ट्राध्यक्ष भी इस अंतिम संस्कार से दूरी बनाए हुए हैं। रूस के राष्ट्रपति पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भी कार्यक्रम में शामिल न होना यह साबित करता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अपने कुछ अनकहे नियम हैं। वैश्विक शांति वार्ता और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए शीर्ष नेताओं का इस समय ईरान से दूर रहना एक कूटनीतिक आवश्यकता बन गया है।
भारत के लिए कूटनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) सर्वोपरि है। खाड़ी देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय रहते हैं। यदि भारत किसी ऐसे कदम को उठाता है जिससे पश्चिमी देशों या खाड़ी देशों के साथ तनाव बढ़े, तो वहां रह रहे भारतीयों की सुरक्षा और रोजगार पर संकट आ सकता है। इसलिए, भारत वही कर रहा है जो एक जिम्मेदार राष्ट्र को करना चाहिए—राष्ट्रीय हितों की रक्षा।
ईरान इसे अपने इतिहास का सबसे बड़ा राजकीय अंतिम संस्कार मान रहा है। 4 जुलाई से 9 जुलाई तक चलने वाला यह कार्यक्रम 6 अलग-अलग शहरों में आयोजित होगा, जिसमें तेहरान, कोम, नजफ, कर्बला और मशहद शामिल हैं। अनुमान है कि इस कार्यक्रम में 2 करोड़ से ज्यादा लोग शामिल होंगे, जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर्प्स (IRGC) को सौंपी गई है।
निष्कर्ष यह है कि भारत का फैसला किसी दबाव के कारण नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता को सुरक्षित रखने के लिए लिया गया एक संतुलित और परिपक्व निर्णय है।
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— Zee News (@ZeeNews) June 30, 2026
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