जंतर-मंतर का पर्दा : कॉकरोच जनता पार्टी के पीछे कौन है ये गुमनाम वॉलंटियर्स की फौज?
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जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का विरोध प्रदर्शन इन दिनों चर्चा में है। प्रदर्शनकारियों की भीड़ के पीछे एक ऐसा अदृश्य तंत्र काम कर रहा है, जो खाने-पीने से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं तक की जिम्मेदारी संभाले हुए है। ये वॉलंटियर्स अपना घर-बार और काम छोड़कर आंदोलन को मजबूती दे रहे हैं।

विभिन्न पेशों के लोग, एक लक्ष्य इस आंदोलन के पीछे 15-20 मुख्य वॉलंटियर्स का एक अनौपचारिक नेटवर्क है। इनमें लखनऊ के एक इलेक्ट्रीशियन, मुंबई के डॉक्टर, दिल्ली के रेहड़ी-पटरी वाले, UPSC की तैयारी करने वाले छात्र और PhD स्कॉलर शामिल हैं। ये लोग मार्शल वॉलंटियर के रूप में सफेद टी-शर्ट पहनकर खाना बांटने और अनुशासन बनाए रखने का काम करते हैं।

पारदर्शी व्यवस्था और आम लोगों का सहयोग वॉलंटियर्स का कहना है कि वे नकद दान लेने से परहेज करते हैं ताकि पारदर्शिता बनी रहे। लोग खुद घर से बना खाना लाते हैं या डिलीवरी ऐप्स के जरिए पानी, बिस्किट और अन्य जरूरी सामान भेजते हैं। जरूरत पड़ने पर वॉलंटियर्स आपस में थोड़े-थोड़े पैसे इकट्ठा कर सामान खरीदते हैं। एक बार तो कोई अज्ञात व्यक्ति 50 किलो वेज पुलाव छोड़कर चला गया, जो प्रदर्शनकारियों के काम आया।

व्यक्तिगत त्याग की दास्तां आंदोलन में शामिल लोग अपनी रोजी-रोटी का नुकसान उठाकर भी डटे हैं। नोएडा के छोटे कारोबारी ब्रजेश पांडे, जो खुद को गौ रक्षक बताते हैं, प्रतिदिन करीब 3,000 रुपये का नुकसान झेलकर यहां व्यवस्था संभाल रहे हैं। वहीं, एक पीएचडी स्कॉलर हर रोज पढ़ाई के बाद वजीराबाद से जंतर-मंतर पहुंचती हैं ताकि छात्रों के मुद्दों को आवाज दी जा सके।

स्वास्थ्य सेवा और पुलिस की निगरानी प्रदर्शन स्थल पर एक अस्थायी डिस्पेंसरी भी चल रही है, जिसे मुंबई के डॉक्टर सुरेश अभिमान गवई संभाल रहे हैं। हालांकि, इन व्यवस्थाओं को चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है। वॉलंटियर्स का आरोप है कि पुलिस द्वारा सामान पहुंचाने वालों की पहचान की जांच और पूछताछ से मददगारों में डर का माहौल है। हाल ही में पुलिस के टोकने पर खाना ले जा रहा एक ऑटो ड्राइवर सामान बिना उतारे ही वापस लौट गया था।

कोई औपचारिक संगठन नहीं, बस जज्बा CJP के प्रवक्ता आशुतोष रांका के अनुसार, इस आंदोलन के पीछे कोई बड़ा फंडिंग संगठन नहीं है, बल्कि यह आम लोगों की स्वतःस्फूर्त भागीदारी है। स्वयंसेवक शिफ्ट में काम करते हैं ताकि 24 घंटे सातों दिन व्यवस्था बनी रहे। प्रदर्शनकारी और वॉलंटियर्स का साफ कहना है कि जब सिस्टम युवाओं की उम्मीदें तोड़ता है, तो ऐसे आंदोलनों का जन्म होना लाजिमी है, जहां लोग खुद अपनी सुरक्षा और जरूरतों का जिम्मा उठा लेते हैं।

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