कर्बला की याद और युद्ध का दंश: ईरान में इस बार क्यों अलग था मुहर्रम का मातम?
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ईरान में इस साल मुहर्रम का आयोजन सामान्य दिनों की तुलना में कहीं अधिक भावुक और चुनौतीपूर्ण रहा। देशभर में लाखों लोगों ने काले वस्त्र धारण कर इमाम हुसैन की शहादत को याद किया, लेकिन इस बार मातम के साथ-साथ हालिया युद्ध का दर्द भी गहरा था।

युद्ध के साये में आशूरा यह मुहर्रम इसलिए भी खास और गमगीन था, क्योंकि यह फरवरी में हुए हमलों के बाद का पहला मुहर्रम था। इन सैन्य हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई, शीर्ष सैन्य अधिकारी और हजारों आम नागरिक मारे गए थे। कर्बला की ऐतिहासिक शहादत को याद करते हुए लोगों ने हालिया युद्ध में जान गंवाने वाले नागरिकों को भी श्रद्धांजलि दी।

सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब मुहर्रम की 10वीं तारीख यानी आशूरा गुरुवार को ईरान के चप्पे-चप्पे पर मातम का माहौल रहा। शहरों और गांवों में लाखों लोगों ने सड़कों पर उतरकर सीना पीटा और नौहे (शोक गीत) गाए। हर तरफ या हुसैन की गूंज सुनाई दे रही थी, जो अन्याय के खिलाफ इमाम हुसैन के संघर्ष को बयां कर रही थी।

न्याय के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक आशूरा का दिन 680 ईस्वी की कर्बला की जंग की याद दिलाता है। पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन ने यजीद की विशाल सेना के सामने घुटने टेकने के बजाय अन्याय के खिलाफ लड़ना चुना। आज भी शिया समुदाय के लिए यह दिन अत्याचार के विरुद्ध खड़े होने का सबसे बड़ा प्रतीक है। पूरे ईरान में इस दौरान नज़री (मुफ्त भोजन) का वितरण किया गया, जिसे इमाम हुसैन की उदारता और सेवा के संदेश के रूप में देखा गया।

तासुआ और परंपराओं का निर्वहन आशूरा से एक दिन पहले तासुआ मनाया गया, जिसमें हजरत अब्बास की बहादुरी और शहादत को याद किया गया। काशान जैसे ऐतिहासिक शहरों में सदियों पुरानी परंपराओं, जैसे कि नखल-गरदानी (पालकी जुलूस) के साथ शोक सभाएं आयोजित की गईं।

ईरान ही नहीं, बल्कि दुनिया भर से लाखों जायरीन कर्बला (इराक) पहुंचे। इमाम हुसैन की दरगाह पर माथा टेककर उन्होंने न केवल अपनी आस्था जताई, बल्कि शांति की कामना भी की।

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