लखनऊ अग्निकांड: पापा बचा लो... फोन पर गूँजी आखिरी चीख, राख हुए कई घरों के चिराग
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लखनऊ के अलीगंज इलाके में सोमवार को हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। आग की लपटों ने न केवल एक इमारत को अपनी चपेट में लिया, बल्कि कई परिवारों के सुनहरे भविष्य और उम्मीदों को भी राख में बदल दिया। इस हादसे में 15 लोगों की मौत हो गई, जबकि कई घायल हैं।

पापा, आग लग गई है... मुझे बचा लो हादसे के वक्त का सबसे खौफनाक मंजर वह था, जब अंदर फंसे युवा अपने परिजनों को आखिरी बार फोन कर रहे थे। आलमबाग निवासी पारिजोत सिंह को दोपहर में बेटे का फोन आया, जिसमें वह डर से कांपते हुए मदद मांग रहा था। पिता तुरंत मौके की ओर दौड़े, लेकिन प्रशासन की घेराबंदी और फैलते धुएं के कारण वे बेबस खड़े देखते रहे।

नियति के आगे हारे पिता यही दर्द सुखमणि सिंह के पिता ने भी महसूस किया। दोपहर 2:15 बजे बेटे का कॉल आया— पापा, मुझे बचा लीजिए। पिता पूरी हिम्मत के साथ घटनास्थल तक पहुंचे, लेकिन तब तक आग विकराल हो चुकी थी। वहां पहुंचना तो दूर, वे सिर्फ अपने बेटे की सलामती की दुआ करने के अलावा कुछ न कर सके।

धुएं के बीच दबीं आवाजें एनिमेशन स्टूडियो में काम करने वाले 25 वर्षीय आदित्य ने भी अपने दोस्त को फोन कर निकालने की गुहार लगाई थी। जब आदित्य की मां घटनास्थल पहुंचीं, तो उनका विलाप सुनकर वहां मौजूद हर किसी की आंखें नम हो गईं। मां का आरोप है कि यदि बचाव कार्य में तेजी दिखाई जाती, तो शायद उनके बेटे समेत कई अन्य बच्चों की जान बच सकती थी।

जान बचाने के लिए छलांग आग इतनी तेजी से फैली कि किसी को समझ नहीं आया कि बाहर कैसे निकलें। जान बचाने की जद्दोजहद में कई छात्र तीसरी मंजिल की खिड़कियों से कूदने को मजबूर हुए। कुछ लोग पाइप और बिजली के तारों के सहारे नीचे उतरने की कोशिश करते नजर आए। चारों ओर फैली चीख-पुकार और धुएं ने वहां का माहौल नरक सा बना दिया था।

घर का इकलौता सहारा छीना हादसे में जान गंवाने वाले अब्दुल रहमान जैसे कई युवा ऐसे थे, जिन पर पूरे परिवार का दारोमदार था। अब्दुल के पिता लकवाग्रस्त हैं और घर की आर्थिक स्थिति उसे ही संभालनी थी। उसकी मौत ने न केवल एक बेटा छीना, बल्कि पूरे परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़कर रख दिया है।

व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल अलीगंज अग्निकांड ने सुरक्षा मानकों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन बच्चों ने सफलता के सपने लिए थे, वे अब सिर्फ यादों और तस्वीरों में सिमट गए हैं। घटनास्थल पर मौजूद परिजन आज भी उसी सवाल के साथ खड़े हैं—क्या इन मौतों को रोका जा सकता था? यह हादसा एक ऐसा जख्म बन गया है जिसे समय का मरहम भी शायद कभी नहीं भर पाएगा।

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