फिर आएगा महिला आरक्षण? मोदी सरकार की मंत्री ने विपक्ष को दी चेतावनी
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देश में महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को लेकर सियासी पारा फिर चढ़ गया है। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी के ताजा बयान ने इस बहस को नई दिशा दे दी है। उन्होंने विपक्ष को नसीहत देते हुए कहा कि महिलाओं के अधिकार के मामले में पुरानी गलतियां दोहराना भारी पड़ सकता है।

विपक्ष पर साधा निशाना

दिल्ली में मीडिया से मुखातिब होते हुए अन्नपूर्णा देवी ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि जब नारी शक्ति वंदन अधिनियम लाया गया था, तब विपक्ष ने न केवल इसका विरोध किया, बल्कि विधेयक के अटकने पर सदन में मेजें थपथपाकर जश्न मनाया था।

मंत्री ने कड़े शब्दों में कहा, विपक्ष को समझ लेना चाहिए कि महिलाएं बहुत कुछ सह सकती हैं, लेकिन अपना अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। पश्चिम बंगाल और असम के चुनावों में जनता ने उन्हें इसका करारा जवाब दिया है। विपक्ष ऐसी गलती दोबारा न करे।

पीएम मोदी की प्रतिबद्धता पर जोर

अन्नपूर्णा देवी ने इस बात पर जोर दिया कि महिला आरक्षण का मुद्दा दशकों से लंबित था, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हकीकत में बदला है। उन्होंने विपक्ष से अपील की कि वे राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठें और महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए सरकार का सहयोग करें, ताकि उन्हें उनके पूर्ण अधिकार मिल सकें।

मानसून सत्र का क्या है सच?

महिला आरक्षण के जल्द लागू होने की अटकलों के बीच संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्थिति स्पष्ट की है। रिजिजू ने साफ किया कि संसद के आगामी मानसून सत्र में महिला आरक्षण या परिसीमन विधेयक लाने पर अभी तक कैबिनेट में कोई चर्चा या फैसला नहीं हुआ है।

हालांकि, रिजिजू ने दोहराया कि केंद्र सरकार विधानमंडलों में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण के अपने संकल्प पर पूरी तरह कायम है। गौरतलब है कि अप्रैल 2026 में सरकार द्वारा लाए गए संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत न मिल पाने के कारण यह मामला फिलहाल रुका हुआ है।

जमीनी हकीकत: अभी लंबा है सफर

एक तरफ कानून की चर्चा है, तो दूसरी तरफ एडीआर (ADR) की रिपोर्ट ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए हैं। हालिया लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की संख्या महज 10.2 प्रतिशत रही।

रिपोर्ट बताती है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में 152 सीटें ऐसी थीं जहाँ एक भी महिला उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ रही थी। राजनीतिक दलों का दावा कुछ भी हो, लेकिन आंकड़ों के आईने में यह साफ है कि 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व का लक्ष्य अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। अब देखना यह होगा कि आने वाले सत्रों में सरकार क्या नया कदम उठाती है।

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