NH-27 का आध्यात्मिक पहरेदार: पूर्णिया का वो मंदिर, जहाँ मंजूरी लिए बिना आगे नहीं बढ़ते मुसाफिर
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पूर्णिया: बिहार के सीमांचल में राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-27 (NH-27) से गुजरने वाले यात्रियों के लिए जलालगढ़ का सीमा काली मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक भरोसा है। पूर्णिया और अररिया जिले की सीमा पर स्थित यह मंदिर राहगीरों के लिए सुरक्षा का प्रतीक बन चुका है।

सफर की शुरुआत मां की अनुमति से इस फोरलेन हाईवे से गुजरने वाले सैकड़ों वाहन चालक यहां रुकना कभी नहीं भूलते। ट्रक, बस और निजी कारों के पहिए मंदिर के सामने थम जाते हैं। यात्री माता के दरबार में माथा टेकते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं और यात्रा की सफलता के लिए अनुमति मांगते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि जो भी यहां हाजिरी लगाता है, उसकी यात्रा विघ्न-बाधा से मुक्त रहती है।

लंबी दूरी का आदर्श विश्राम स्थल हाईवे के किनारे हरियाली के बीच स्थित होने के कारण यह मंदिर एक शांत विश्राम स्थल के रूप में भी जाना जाता है। असम, सिलीगुड़ी, पटना और दिल्ली जैसे लंबी दूरी के रूट पर जाने वाले मुसाफिर यहां थोड़ी देर सुस्ताते हैं। मंदिर परिसर में हमेशा भक्तों की चहल-पहल रहती है, जिससे वहां का माहौल अक्सर किसी मेले जैसा प्रतीत होता है।

54 साल पुरानी परंपरा और अखंड विश्वास मंदिर की ख्याति इसकी पुरानी परंपराओं से जुड़ी है। वर्ष 1972 से यहां दीपावली के मौके पर 48 घंटे का अखंड रामधुन संकीर्तन किया जा रहा है। चार दिनों तक चलने वाले इस भव्य उत्सव में सीमांचल के अलावा नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। वहीं, 1 जनवरी को यहां भक्तों का तांता लग जाता है, जहां लोग नए साल की शुरुआत माता के आशीर्वाद से करते हैं।

कांवरियों के लिए 30 दिनों की विशेष सेवा मंदिर की उदारता का प्रमाण सावन के महीने में मिलता है। समिति और ग्रामीणों के सहयोग से यहां देवघर जाने वाले कांवरियों के लिए पूरे 30 दिनों का निःशुल्क सेवा शिविर लगाया जाता है। भव्य पंडाल, आकर्षक लाइटिंग और यज्ञ भवन की सजावट भक्तों का मन मोह लेती है।

जन-सहयोग से बढ़ रही भव्यता मंदिर का स्वरूप आज जितना विशाल है, उसका पूरा श्रेय स्थानीय ग्रामीणों, राहगीरों और श्रद्धालुओं को जाता है। लोगों द्वारा स्वेच्छा से दिए गए दान ने इस छोटे से स्थान को एक भव्य आध्यात्मिक केंद्र में बदल दिया है। जैसे-जैसे NH-27 पर ट्रैफिक का दबाव बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ‘मां काली सीमावाली’ की महिमा भी दूर-दूर तक फैल रही है। आज यह मंदिर पूर्णिया का सबसे सुरक्षित और पावन प्रवेश द्वार माना जाता है।

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