मोदी-ट्रंप मुलाकात से पहले बड़ा कूटनीतिक झटका: अमेरिका ने अपनी कमांड से इंडो शब्द हटाया
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पेरिस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बहुप्रतीक्षित मुलाकात से ठीक पहले अमेरिका ने एक बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव किया है। अमेरिकी प्रशासन ने अपनी प्रमुख सैन्य कमान इंडो-पैसिफिक कमांड (INDOPACOM) का नाम बदलकर फिर से यूएस पैसिफिक कमांड (USPACOM) कर दिया है।

यह फैसला भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।

इंडो हटाना क्या दर्शाता है?

साल 2018 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान, तत्कालीन रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने यूएस पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर इंडो-पैसिफिक कमांड किया था। उस समय इसका उद्देश्य एशिया में भारत की बढ़ती भूमिका और क्वाड (QUAD) गठबंधन को मजबूती देना था।

अब पेंटागन ने आधिकारिक घोषणा करते हुए इसे फिर से पुरानी पहचान दे दी है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इंडो शब्द को हटाना यह संकेत देता है कि अमेरिका अब हिंद महासागर की तुलना में प्रशांत महासागरीय क्षेत्र (चीन, ताइवान, जापान) पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहता है।

क्या भारत को किनारे किया जा रहा है?

भू-राजनीतिक विश्लेषक आर. जगन्नाथन के अनुसार, यह बदलाव स्पष्ट करता है कि अमेरिका अपनी एशिया नीति को अब भारत-केंद्रित नहीं रखना चाहता। उनका कहना है कि अमेरिका की प्राथमिकता ताइवान, जापान और फिलीपींस जैसे पश्चिमी प्रशांत देश हैं।

विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि अमेरिका को अब चीन को काउंटर करने के लिए भारत की वह अहमियत महसूस नहीं हो रही, जो पहले थी। हाल के दिनों में भारत पर टैरिफ बढ़ाना और अन्य कूटनीतिक रुख अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं को दर्शाते हैं।

भारत के लिए सबक: आत्मनिर्भरता की जरूरत

इस घटनाक्रम के बाद भारत के रणनीतिक हलकों में चिंताएं बढ़ गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता भारत के लिए जोखिम भरी हो सकती है।

हालिया घटनाओं, जिनमें भारतीय नाविकों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं, पर अमेरिका का उदासीन रुख भारत के लिए एक चेतावनी है। जानकारों का कहना है कि अब समय आ गया है कि भारत अपनी आर्थिक और रक्षा संप्रभुता को और अधिक आत्मनिर्भर बनाए, क्योंकि भू-राजनीति में कोई भी गठबंधन स्थायी नहीं होता।

यह कदम पीएम मोदी और ट्रंप की आगामी बैठक के एजेंडे को भी प्रभावित कर सकता है। अब देखना यह है कि भारत इस कूटनीतिक बदलाव पर क्या रुख अपनाता है।

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