G7 शिखर सम्मेलन: तनाव के बीच मोदी-ट्रंप की मुलाकात ने दी नई हलचल
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पेरिस: फ्रांस की राजधानी पेरिस में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई मुलाकात ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। 16 महीने बाद हुई यह अनौपचारिक मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब भारत और अमेरिका के बीच कई मुद्दों पर कूटनीतिक तनातनी चल रही है।

16 महीने बाद आमने-सामने

पिछली बार ये दोनों नेता फरवरी 2025 में व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में मिले थे, जब ट्रंप ने दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली थी। तब से अब तक के 16 महीनों में दोनों देशों के रिश्तों में काफी उतार-चढ़ाव आए हैं। पेरिस में दोनों नेताओं का गर्मजोशी से हाथ मिलाना और बातचीत करना इस बात का संकेत है कि दोनों देश संवाद का दरवाजा खुला रखना चाहते हैं।

तनाव की पृष्ठभूमि: नौसेना विवाद

भारत-अमेरिका संबंधों में हालिया गिरावट का मुख्य कारण ओमान के पास अमेरिकी नौसेना के एक अभियान के दौरान तीन भारतीय नाविकों की दुखद मौत है। इस घटना ने दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी पैदा कर दी है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के सामने यह मुद्दा पुरजोर तरीके से उठाया था।

हालांकि, अमेरिकी पक्ष द्वारा अपने सैन्य प्रोटोकॉल का हवाला देना और भारतीय नाविकों की मौत के मामले में सख्त रुख अपनाना भारत को नागवार गुजरा। अमेरिका द्वारा सैन्य आदेशों के पालन पर दिया गया बयान भी दोनों देशों के संबंधों में असहजता का एक बड़ा कारण बना।

कूटनीतिक संकेत है यह मुलाकात

जी7 के मंच पर मोदी और ट्रंप की यह मुलाकात किसी बड़े औपचारिक समझौते का परिणाम नहीं है, लेकिन इसका राजनीतिक महत्व कहीं अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को लेकर अडिग है। इस मुलाकात के जरिए दोनों देशों ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि कूटनीतिक असहमति के बावजूद, शीर्ष स्तर पर संवाद जारी रहेगा।

भारत की भूमिका और भविष्य की राह

आज भारत वैश्विक मंच पर एक ऐसी शक्ति के रूप में उभरा है जिसे नजरअंदाज करना किसी भी देश के लिए कठिन है। जी7 में मोदी की सक्रिय भागीदारी बताती है कि भारत विश्व शांति और स्थिरता के एजेंडे में अपनी भूमिका को लेकर गंभीर है।

रक्षा, व्यापार और तकनीक जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच गहरी साझेदारी है और ये मुद्दे भविष्य में भी संबंधों का आधार बने रहेंगे। हालांकि, फिलहाल सभी की नजरें इस बात पर हैं कि क्या यह छोटी सी मुलाकात भारत और अमेरिका के बीच हालिया कड़वाहट को कम करने में मददगार साबित होगी या दोनों देश आगे चलकर किसी समाधान पर पहुंचेंगे।

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