मई में अदावत, जून में बगावत और जुलाई में सदारत : ममता की टीएमसी पर संकट का साया
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ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) इन दिनों असली और नकली की उस सियासी लड़ाई में फंसी है, जिसने कभी उद्धव ठाकरे की शिवसेना को हाशिए पर ला खड़ा किया था। 4 मई के चुनावी नतीजों के बाद से ममता की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं।

भीतरघात: क्यों नहीं संभल पाई ममता?

राजनीतिक विश्लेषक ममता बनर्जी की वर्तमान स्थिति की तुलना महाभारत के धृतराष्ट्र से कर रहे हैं। जिस तरह धृतराष्ट्र अपने पुत्र मोह में सही-गलत का फर्क भूल गए थे, ममता बनर्जी पर भी अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के प्रति मोह का आरोप लग रहा है। पार्टी के भीतर सालों से पनप रहा असंतोष ममता को तब दिखाई नहीं दिया, जब वह बहुत देर हो चुकी थी।

जून में बगावत और समीकरणों का खेल

जून का महीना टीएमसी के लिए विखंडन का काल साबित हुआ। पार्टी के 28 में से 20 सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का ऐलान कर दिया है। आश्चर्य की बात यह है कि एक अनजान से दल के साथ जुड़ते ही यह संख्या बल उसे देश की पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी बना देता है। बागियों ने भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के साथ बैठक की और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मिलकर अलग बैठने की मांग कर ली है। साथ ही, उन्होंने एनडीए को समर्थन देने का भी संकेत दिया है।

जुलाई का मास्टरप्लान : नाम और निशान पर दावा

बगावत की आग यहीं नहीं रुकने वाली। बागी नेता सुदीप बंदोपाध्याय ने खुले तौर पर चेतावनी दी है। उनका कहना है कि चूंकि उनके पास दो-तिहाई बहुमत है, इसलिए वे कानूनी प्रक्रिया के जरिए जुलाई में तृणमूल नाम और पार्टी के चुनाव चिह्न पर दावा पेश करेंगे। सुदीप का बयान ममता के लिए सबसे बड़ी चेतावनी है: जब आप दो-तिहाई सदस्यों के साथ अलग होते हैं, तो आप पहले ही दिन पार्टी का नाम नहीं मांगते। हम जुलाई में इसकी मांग पूरी मजबूती से करेंगे।

बागी खेमे के प्रमुख चेहरे

इस बगावत की कमान जिन नेताओं के हाथ में है, उनमें काकोली घोष दस्तीकार और सुदीप बंदोपाध्याय प्रमुख हैं। साथ ही, इस लिस्ट में शताब्दी रॉय, सायोनी घोष, यूसुफ पठान, देव और माला रॉय जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं।

ममता के हाथ से फिसलती जमीन

ममता बनर्जी, जो कभी अपनी फायरब्रांड छवि और आक्रामक राजनीति के लिए जानी जाती थीं, आज अपनी ही पार्टी में अलग-थलग पड़ती दिख रही हैं। बागी गुट ने न केवल ममता के नेतृत्व को चुनौती दी है, बल्कि उन्हें अदालती लड़ाई में फंसाने की भी तैयारी कर ली है। मई में शुरू हुई अदावत अब ममता के सियासी अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। क्या ममता अपनी पार्टी को टूटने से बचा पाएंगी, या जुलाई का महीना तृणमूल के इतिहास का आखिरी पन्ना साबित होगा?

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