फरसा और संविधान: राहुल गांधी के परशुराम अवतार से कांग्रेस ने बदला सियासी खेल
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भारतीय राजनीति में प्रतीकों की भाषा सबसे ताकतवर होती है। हाल ही में वाराणसी के गंगा घाट पर यूथ कांग्रेस द्वारा जारी राहुल गांधी का एक पोस्टर चर्चा का केंद्र बन गया है, जिसमें उन्हें भगवान परशुराम के अवतार में दिखाया गया है। एक हाथ में फरसा और दूसरे हाथ में संविधान लिए राहुल की यह तस्वीर कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

ब्राह्मणों को साधने की सांस्कृतिक कोशिश पौराणिक कथाओं में भगवान परशुराम ब्राह्मण समाज के गौरव और न्याय के प्रतीक हैं। उत्तर प्रदेश और हिंदी पट्टी के राज्यों में ब्राह्मण मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए सभी दल प्रयासरत हैं। राहुल गांधी के हाथ में फरसा दिखाकर कांग्रेस ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि सनातन परंपरा और इसके नायक किसी एक राजनीतिक दल की बपौती नहीं हैं। यह कदम भाजपा के कट्टर हिंदुत्व के नैरेटिव को संतुलित करने की एक कोशिश है।

संविधान के जरिए सामाजिक न्याय का दांव पोस्टर के दूसरे हाथ में भारतीय संविधान की प्रति है। 2024 के लोकसभा चुनाव में संविधान बचाओ का नारा कांग्रेस के लिए गेम-चेंजर साबित हुआ था, जिसने दलित, पिछड़े और आदिवासी समुदायों को एकजुट किया। अब नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी खुद को संवैधानिक मूल्यों के रक्षक के रूप में पेश कर रहे हैं, ताकि वे अपनी सामाजिक न्याय की पिच पर मजबूती से टिके रहें।

आक्रामक तेवर: अब रक्षात्मक नहीं, फ्रंट-फुट पर सियासत भगवान परशुराम को शास्त्रों और अस्त्रों, दोनों का ज्ञाता माना जाता है। राहुल के हाथ में फरसा उनके बदले हुए राजनीतिक तेवर का संकेत है। अब कांग्रेस रक्षात्मक राजनीति छोड़कर सरकार की नीतियों पर आक्रामक रुख अपना रही है। यह तस्वीर अन्याय के संहार (फरसा) और लोकतांत्रिक मूल्यों (संविधान) के एक अनूठे मिश्रण को दर्शाती है।

अगड़ा और पिछड़ा: क्या मिल पाएगा साथ? कांग्रेस अब एक ऐसे फॉर्मूले पर काम कर रही है, जो अगड़ों और पिछड़ों को एक साथ एक मंच पर ला सके। फरसा और संविधान की यह जुगलबंदी आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में क्या गुल खिलाएगी, यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन इतना तय है कि कांग्रेस अब भाजपा की पिच पर बैकफुट पर खेलने के बजाय अपनी सांस्कृतिक और संवैधानिक लकीर खींचने की तैयारी में है।

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