बांग्लादेश में IFS नहीं, राजनेता बने उच्चायुक्त: भारत की नई कूटनीतिक चाल के मायने
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ढाका में दिनेश त्रिवेदी की नियुक्ति: परंपरा से अलग हटकर सरकार का बड़ा दांव

भारत सरकार ने बांग्लादेश में अपने नए उच्चायुक्त के रूप में पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ नेता दिनेश त्रिवेदी को नियुक्त किया है। आमतौर पर इन महत्वपूर्ण पदों पर भारतीय विदेश सेवा (IFS) के अनुभवी अधिकारी तैनात होते हैं, लेकिन त्रिवेदी की नियुक्ति यह दर्शाती है कि भारत ने अपनी बांग्लादेश नीति में रणनीतिक बदलाव किया है। 12 जून को सड़क मार्ग से बांग्लादेश पहुंचे त्रिवेदी ने प्रणय वर्मा का स्थान लिया है।

सड़क मार्ग से संदेश: कूटनीति में एक प्रतीकात्मक शुरुआत

दिनेश त्रिवेदी का हवाई मार्ग के बजाय सड़क मार्ग (बेनापोल लैंड पोर्ट) से ढाका पहुंचना महज एक यात्रा नहीं, बल्कि एक कड़ा संदेश है। 4,096 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा दोनों देशों के बीच संबंधों की धुरी है। हाल के दिनों में बांग्लादेश का पाकिस्तान की ओर बढ़ता झुकाव और चीन की बढ़ती सक्रियता के बीच, भारत का यह कदम इस बात को रेखांकित करता है कि दोनों देशों के बीच भौतिक और राजनीतिक संपर्क भारत की प्राथमिकता में शीर्ष पर है।

राजनीतिक नियुक्तियों का इतिहास और वर्तमान जरूरत

आजादी के शुरुआती वर्षों में आसफ अली और विजय लक्ष्मी पंडित जैसे राजनेताओं को राजदूत बनाना आम था, लेकिन बाद के दशकों में यह भूमिका पूरी तरह से पेशेवर राजनयिकों के पास चली गई। अब बांग्लादेश की बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों ने सरकार को फिर से राजनीतिक कूटनीति की ओर लौटने पर मजबूर किया है। शेख हसीना के सत्ता से हटने और वहां बने अंतरिम हालातों के बाद, भारत को लगता है कि एक राजनेता लोगों की नब्ज को एक करियर डिप्लोमैट से बेहतर समझ सकता है।

बदलती रणनीति: सिर्फ एक धड़े पर निर्भरता खत्म?

जानकारों का मानना है कि शेख हसीना सरकार के पतन का पूर्वानुमान न लगा पाना भारतीय दूतावास की एक बड़ी विफलता रही। अब भारत सिर्फ एक राजनीतिक दल या परिवार के साथ संबंध रखने के बजाय बांग्लादेश के सभी प्रमुख शक्ति केंद्रों से संवाद बनाना चाहता है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर का खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल होना और अब एक अनुभवी राजनेता की तैनाती इसी व्यापक आउटरीच रणनीति का हिस्सा है।

चीन और सुरक्षा: सबसे बड़ी चुनौती

बांग्लादेश इस वक्त खुफिया एजेंसियों का अखाड़ा बन चुका है। चीन का बुनियादी ढांचा निवेश और म्यांमार सीमा के पास पनपते समीकरण भारत के लिए चिंता का विषय हैं। साथ ही, तीस्ता नदी जल बंटवारा, अवैध घुसपैठ और रक्षा सहयोग जैसे जटिल मुद्दे त्रिवेदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती होंगे।

त्रिवेदी का अनुभव: एक बड़ी ताकत

दिनेश त्रिवेदी का पश्चिम बंगाल से पुराना नाता है। भाषा, संस्कृति और भौगोलिक निकटता के कारण वे बांग्लादेश की स्थानीय राजनीति को बेहतर समझ सकते हैं। रेल मंत्री और स्वास्थ्य राज्य मंत्री के रूप में कार्य कर चुके त्रिवेदी का संसदीय अनुभव उन्हें जटिल समझौतों और वार्ताओं में एक अनुभवी वार्ताकार (Negotiator) बनाता है। यह नियुक्ति स्पष्ट करती है कि भारत अब औपचारिक प्रोटोकॉल से आगे बढ़कर एक एग्रेसिव और लचीली कूटनीति अपना रहा है।

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