तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर चल रहा घमासान अब किसी छिपे विवाद का हिस्सा नहीं रहा। ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में शुमार वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी की हालिया बगावत ने पार्टी की नींव हिला दी है। उन्होंने साफ शब्दों में ममता के सामने शर्त रख दी है—या तो पार्टी में अभिषेक बनर्जी रहेंगे या फिर वे।
ममता के भरोसेमंद का अल्टीमेटम लोकसभा में टीएमसी के मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) कल्याण बनर्जी ने गुरुवार को पार्टी नेतृत्व को सीधे चुनौती दी। उन्होंने कहा, मैं ममता दीदी के साथ हूं, लेकिन अब दीदी को तय करना है कि क्या वो अभिषेक के बिना पार्टी नहीं चला सकतीं? अगर ऐसा है, तो मैं इस पार्टी का हिस्सा नहीं रहूंगा।
यह बयान महज एक नाराजगी नहीं, बल्कि पार्टी में बढ़ रहे उस असंतोष का विस्फोट है, जो लंबे समय से दबी जुबान में सुलग रहा था।
विवाद की जड़: कॉरपोरेट स्टाइल और अपमान कल्याण बनर्जी की नाराजगी की एक बड़ी वजह हालिया कानूनी मामले से उन्हें हटाना है। विधानसभा में फर्जी हस्ताक्षर मामले में अभिषेक बनर्जी के कार्यालय की तलाशी के बाद, कल्याण को बिना बताए दूसरे वकील की नियुक्ति कर दी गई।
कल्याण बनर्जी ने इसे अपना अपमान बताते हुए कहा कि अभिषेक बनर्जी का बर्ताव ऐसा है जैसे वे बाकी सबको अपने से नीचे समझते हैं। कई अन्य नेता पहले भी अभिषेक और चुनावी रणनीतिकार कंपनी आईपैक (I-PAC) पर पार्टी को कॉरपोरेट संस्थान की तरह चलाने और मनमानी करने का आरोप लगा चुके हैं।
क्या टीएमसी बिखराव की ओर है? वरिष्ठ पत्रकार सयांतन घोष का मानना है कि इस बगावत को नजरअंदाज करना पार्टी के लिए घातक होगा। बाहर से होने वाले हमलों से अधिक खतरनाक पार्टी के भीतर का असंतोष है। वहीं, राजनीतिक विश्लेषक वीर सांघवी ने इस स्थिति की तुलना 1977 के कांग्रेस संकट से की है, जब इंदिरा-संजय गांधी के दौर में पार्टी को भारी अंदरूनी तूफानों का सामना करना पड़ा था।
बढ़ती हुई भगदड़ पार्टी में टूट का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। सुष्मिता देव और सुखेंदु शेखर रे जैसे दिग्गजों के इस्तीफों ने ममता के खेमे को कमजोर कर दिया है। काकोली घोष दस्तीदार जैसे नेताओं का बागी तेवर और सांसदों की घटती संख्या यह संकेत दे रही है कि पार्टी का जनाधार तेजी से खिसक रहा है।
राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या टीएमसी अपना चुनाव चिह्न बचा पाएगी या महाराष्ट्र की शिवसेना की तरह पार्टी दो टुकड़ों में बंट जाएगी। फिलहाल ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती न केवल पार्टी को बचाए रखने की है, बल्कि इसे एकजुट रखने की भी है।
Kolkata, West Bengal: TMC MP Kalyan Banerjee said he is with TMC chairperson Mamata Banerjee, but she must decide whether to keep him or Abhishek Banerjee. If she decides she cannot move the party without Abhishek, then he will not be there pic.twitter.com/52XwfuR5Pt
— IANS (@ians_india) June 11, 2026
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