दुनिया जश्न मनाएगी, भारतीय फैंस के छलकेंगे आंसू! 145 करोड़ का देश क्यों नहीं खेलता FIFA वर्ल्ड कप?
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11 जून की तारीख नज़दीक है, अमेरिका में खेलों का महाकुंभ यानी फीफा वर्ल्ड कप शुरू होने जा रहा है। 48 टीमें, 39 दिन और 104 मैचों का रोमांच, लेकिन इस पूरे उत्सव में एक बड़ी कमी है— भारत । 145 करोड़ की आबादी वाला देश इस महामंच पर केवल एक दर्शक बनकर रह गया है।

मेसी के लिए दीवानगी, अपनों से बेरुखी क्यों?

भारत में अर्जेंटीना और ब्राज़ील के झंडे लहराते हैं, मेसी के लिए फैंस की रातें जागकर बीतती हैं। लेकिन अगर दिल्ली की सड़कों पर किसी से भारतीय फुटबॉल टीम के 5 खिलाड़ियों के नाम पूछे जाएं, तो सन्नाटा पसर जाता है। हम विदेशी सितारों की इबादत में इतने खोए हैं कि अपनी ही मिट्टी के हुनर को भूल चुके हैं। आज भारत फीफा रैंकिंग में 137वें पायदान पर है। जिस देश में 2036 ओलंपिक की मेजबानी के सपने देखे जा रहे हों, वहां फुटबॉल की यह हालत एक बड़ा सवाल है।

वर्ल्ड कप के प्रसारण पर संकट, मलाल की कमी क्यों?

हाल ही में जब फीफा वर्ल्ड कप के प्रसारण अधिकार को लेकर अनिश्चितता बनी थी, तो फैंस मैच देखने के तरीके को लेकर चिंतित थे। लेकिन हैरानी की बात यह है कि भारतीय टीम कभी वर्ल्ड कप नहीं खेल पाई, इसे लेकर समाज में कोई सामूहिक गुस्सा या मायूसी नहीं दिखती। हम इस बात से बेचैन हैं कि टीवी पर मैच कैसे दिखेगा, पर इस बात से बेफ़िक्र हैं कि हमारी जर्सी मैदान पर क्यों नहीं है।

1950 का वो चूक, जिसने इतिहास बदल दिया

क्या आपको पता है कि भारत के पास 1950 में फुटबॉल का इतिहास रचने का मौका था? तब भारत सीधे विश्व कप के लिए क्वालीफाई कर गया था, लेकिन खेल संघ (AIFF) ने टीम को ब्राज़ील भेजने से इनकार कर दिया। यह भारतीय खेल इतिहास की सबसे बड़ी भूल साबित हुई। उस दिन अगर हमने पहल की होती, तो शायद आज फुटबॉल की तस्वीर कुछ और होती।

मैदान में फिसड्डी और कोर्ट में उलझा फुटबॉल

मौजूदा हालात और भी चिंताजनक हैं। अफगानिस्तान जैसी टीम से मिली हार और एशिया कप में बिना गोल किए बाहर होना हमारी बदहाली बयां करता है। दूसरी ओर, हमारी अपनी लीग (ISL) कानूनी पचड़ों और सुप्रीम कोर्ट के चक्करों में फंसी है। जब देश की सर्वोच्च लीग ही अदालतों में उलझी हो, तो खिलाड़ियों का मनोबल और खेल का स्तर कैसे सुधरेगा?

क्या हम सिर्फ क्रिकेट के दीवाने बनकर रहेंगे?

1996 में बाइचुंग भूटिया के दौर में जब भारत 94वीं रैंकिंग पर था, तब एक उम्मीद जगी थी। लेकिन आज हम फिर वहीं खड़े हैं। भारत दुनिया में अपनी आर्थिक और तकनीकी शक्ति का लोहा मनवा रहा है, लेकिन खेल के मैदान पर हमारे पैर डगमगा रहे हैं।

यह लेख केवल आलोचना नहीं, बल्कि एक दर्द का इज़हार है। हमें एक ऐसा तंत्र चाहिए जहाँ गलियों से प्रतिभाएं निकलें। ताकि आने वाले समय में जब फीफा का बिगुल बजे, तो 145 करोड़ भारतीय टीवी के सामने बैठकर किसी और के लिए तालियां न बजाएं—बल्कि गर्व से कहें, देखो, नीली जर्सी में हमारी टीम आ रही है, वो भारत है!

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