कर्नाटक में बढ़ती बांग्लादेशी घुसपैठ की आहट: दक्षिण भारत के लिए साफ़ संकेत या गंभीर खतरा?
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कर्नाटक में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। हुबली के श्री सिद्धरूढ़ रेलवे स्टेशन पर हिंदू संगठनों के प्रदर्शन के बाद राज्य में सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता पर सवाल उठने लगे हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पश्चिम बंगाल में कड़े रुख के बाद घुसपैठिए सुरक्षित पनाहगाह की तलाश में दक्षिण भारत का रुख कर रहे हैं।

हुबली स्टेशन पर विरोध और सुरक्षा एजेंसियों की चुनौती

श्रीराम सेना प्रमुख प्रमोद मुथालिक और उनके कार्यकर्ताओं ने हुबली रेलवे स्टेशन पर जोरदार प्रदर्शन किया। उनका तर्क है कि पश्चिम बंगाल से आने वाली ट्रेनों में संदिग्ध लोगों की केवल औपचारिक जाँच की जा रही है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सिर्फ आधार कार्ड दिखाना नागरिकता का पुख्ता सबूत नहीं है, क्योंकि फर्जी दस्तावेज बनवाना अब आसान हो गया है। हाल ही में पकड़े गए 10 संदिग्धों का आधार कार्ड दिखाकर छूट जाना इस दावे को और मजबूत करता है।

क्या 20 लाख घुसपैठिए कर्नाटक में सक्रिय हैं?

हालिया खुफिया रिपोर्टों और दावों के अनुसार, कर्नाटक में करीब 20 लाख बांग्लादेशी घुसपैठियों के होने का अनुमान है। चिंताजनक बात यह है कि इनमें से 70 से 80 प्रतिशत लोगों के पास भारतीय पहचान पत्र मौजूद हैं। ये लोग मुख्य रूप से बेंगलुरु, तटीय क्षेत्रों और मालनाड के कॉफी-सुपारी बागानों में फैले हुए हैं।

सस्ते श्रम का लालच और स्थानीय रोजगार पर संकट

इन घुसपैठियों के प्रति स्थानीय नियोक्ताओं का झुकाव इनके सस्ते श्रम के कारण है। ये लोग स्थानीय मजदूरों की तुलना में 100 से 150 रुपये कम दिहाड़ी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं। बेंगलुरु में कंस्ट्रक्शन साइट्स, कबाड़ की दुकानों, होटलों और सफाई कार्यों में इनकी अच्छी-खासी संख्या देखी जा रही है। मालनाड जैसे कृषि प्रधान इलाकों में भी ये बागानों और एस्टेट में काम कर रहे हैं।

पहचान छिपाने में माहिर और लंबी अवधि का एजेंडा

रिपोर्टों में यह भी खुलासा हुआ है कि पिछले 15 वर्षों से कर्नाटक में रह रहे कई घुसपैठियों ने न केवल भारतीय पहचान पत्र बनवाए हैं, बल्कि संपत्ति भी खरीदी है। कुछ ने भारतीय पासपोर्ट के जरिए विदेशों तक पहुंच बना ली है। यह स्थिति न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर है, बल्कि राज्य की जनसांख्यिकी और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ा खतरा बनती जा रही है।

क्या अभी भी वक्त है संभलने का?

प्रदर्शनकारियों और विशेषज्ञों का मानना है कि रेलवे, स्थानीय पुलिस और खुफिया एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी घुसपैठियों के लिए ढाल बन रही है। यदि समय रहते इनकी गहन पहचान और सत्यापन अभियान नहीं चलाया गया, तो कर्नाटक के लिए आने वाले दिनों में स्थिति संभालना और कठिन हो सकता है। फिलहाल, जनता की मांग है कि प्रतीकात्मक जाँच के बजाय घुसपैठियों के खिलाफ ठोस कानूनी कार्रवाई की जाए।

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