झुलसता भारत: क्या युद्ध से भी ज्यादा खतरनाक होती जा रही है भीषण गर्मी?
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देश इस समय भीषण हीटवेव (लू) की चपेट में है। हालात इतने बेकाबू हैं कि दिल्ली की झीलें सूख चुकी हैं और कश्मीर जैसे ठंडे पहाड़ी इलाके भी लू की मार झेल रहे हैं। यह सिर्फ मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि एक साइलेंट किलर बन चुका है।

दुनिया के सबसे गर्म शहर भारत में 22 मई को दुनिया के 22 सबसे गर्म शहरों का तापमान 47 डिग्री सेल्सियस के पार दर्ज किया गया और हैरानी की बात यह है कि ये सभी शहर भारत के हैं। इनमें 13 शहर अकेले उत्तर प्रदेश के हैं, जबकि ओडिशा का बोलांगीर और बिहार का सासाराम 48 डिग्री के साथ सबसे ऊपर रहे।

युद्ध से तीन गुना ज्यादा घातक द लैंसेट की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर के तमाम युद्धों में हर साल लगभग 1 लाख 60 हजार लोगों की मौत होती है। वहीं, भीषण गर्मी और हीटवेव के कारण होने वाली मौतों का आंकड़ा 5 लाख 46 हजार से ज्यादा है। यानी गर्मी, युद्ध की तुलना में तीन गुना ज्यादा लोगों की जान ले रही है।

पहाड़ों की ठंडी हवाएं गायब इस बार हिल स्टेशनों का हाल भी बेहाल है। सर्दियों में बर्फबारी की कमी के कारण शिमला, मसूरी और नैनीताल जैसे इलाके सामान्य से 5 से 7 डिग्री ज्यादा गर्म हैं। श्रीनगर और यमुनोत्री तक तप रहे हैं। पहाड़ों का यह उबलना पारिस्थितिक तंत्र के लिए खतरे की घंटी है।

अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ती गर्मी गर्मी सिर्फ स्वास्थ्य के लिए नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के लिए भी घातक है। भारत को हर साल गर्मी के कारण लगभग 13.5 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। तापमान में हर 1 डिग्री की बढ़ोतरी से मजदूरों की क्षमता और मजदूरी में 16 प्रतिशत की गिरावट आती है, वहीं गेहूं की फसल में 7 प्रतिशत तक कमी दर्ज की जाती है। आशंका है कि 2030 तक गर्मी के कारण भारत में 3.4 करोड़ नौकरियां खत्म हो सकती हैं।

ज़हरीली ओजोन का खतरा उत्तर भारत के गंगा के मैदानों में ग्राउंड-लेवल ओजोन का स्तर तेजी से बढ़ रहा है। यह ओजोन फेफड़ों के लिए धीमे जहर का काम करती है। दिल्ली-एनसीआर, यूपी और बिहार में इसका स्तर सुरक्षित सीमा से अधिक पाया गया है, जो सीधे तौर पर सांसों पर हमला कर रहा है।

अल-नीनो और भविष्य का संकट मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, भारत का औसत तापमान 1901 के बाद से 0.7 डिग्री बढ़ चुका है। इस साल सुपर अल-नीनो की 33 प्रतिशत आशंका है, जिससे मॉनसून 8 प्रतिशत तक कम हो सकता है। यह संकट देश के 60 प्रतिशत किसानों के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकता है, जो सिंचाई के लिए पूरी तरह बारिश पर निर्भर हैं।

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