सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर अखिलेश यादव: क्या 2027 में प्रभु राम ही होंगे सपा की नैया के खेवनहार?
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। मुस्लिम और यादव वोटों की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी (सपा) अब भगवान राम और हनुमान के नाम का सहारा लेकर 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछा रही है। पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव अब अपनी छवि हिंदू विरोधी से बदलकर सॉफ्ट हिंदुत्व की ओर ले जा रहे हैं।

रामचरितमानस को बताया सांस्कृतिक संविधान हाल ही में लखनऊ में पुलिस लाठीचार्ज के दौरान एक वकील के हाथ से रामचरितमानस गिरने और उसे पीटे जाने की घटना को अखिलेश ने बड़ा मुद्दा बना लिया है। उन्होंने न केवल इस घटना की कड़ी निंदा की, बल्कि रामचरितमानस को सांस्कृतिक संविधान तक करार दे दिया। अखिलेश ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि जो लोग खुद को हिंदू रक्षक कहते हैं, उनकी पुलिस ही भगवान के ग्रंथ का अपमान कर रही है। उन्होंने पीड़ित अधिवक्ता को रामचरितमानस भेंट कर अपनी नई सियासी लाइन स्पष्ट कर दी है।

बदला अखिलेश का अंदाज सिर्फ रामचरितमानस ही नहीं, अखिलेश ने बड़ा मंगल के मौके पर भंडारे का आयोजन कर और शुभकामनाएँ देकर अपने बदलते तेवर दिखाए हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अखिलेश यादव ज्योतिष शास्त्र और धार्मिक प्रतीकों को अपनी राजनीति का हिस्सा बना रहे हैं। सैफई में शिव मंदिर का निर्माण और सार्वजनिक रूप से पूजा-पाठ की तस्वीरें यह बताने के लिए काफी हैं कि सपा अब केवल एक वर्ग की नहीं, बल्कि व्यापक हिंदू आबादी को साधने की कोशिश कर रही है।

विवादों से किनारा करने की कोशिश सपा के इतिहास में राम मंदिर और हिंदू धर्मग्रंथों पर नेताओं के विवादित बयानों ने पार्टी को काफी नुकसान पहुँचाया है। स्वामी प्रसाद मौर्य के रामचरितमानस पर दिए बयान हों या राजकुमार भाटी की ब्राह्मणों पर टिप्पणी, भाजपा ने इन बयानों को बार-बार सपा की हिंदू विरोधी मानसिकता बताकर भुनाया है। अखिलेश अब इन विवादों और ऐसे नेताओं से दूरी बनाकर अपनी छवि सुधारने में जुटे हैं, ताकि ममता बनर्जी जैसी हार से उत्तर प्रदेश में बचा जा सके।

रणनीति में ब्राह्मण चेहरों का महत्व लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद, अखिलेश ने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर ब्राह्मण चेहरे माता प्रसाद पांडे को जगह देकर यह संदेश दिया कि वे पारंपरिक वोट बैंक से बाहर निकलना चाहते हैं। हालांकि, भाजपा इसे सपा की दिखावटी राजनीति और पाखंड बताकर खारिज कर रही है, लेकिन यह साफ है कि 2027 की लड़ाई अब केवल जातिगत समीकरणों तक सीमित नहीं रहेगी।

क्या अखिलेश यादव की यह नई धार्मिक सक्रियता 2027 के विधानसभा चुनाव में उनके बेड़ा पार लगाने में सफल होगी? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि यूपी की राजनीति अपनी धुरी बदलती हुई नजर आ रही है।

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