CBSE का ऑन-स्क्रीन संकट: पोर्टल क्रैश और खराब रिजल्ट से छात्रों में उबाल, उठाई बहिष्कार की मांग
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नई दिल्ली: देश की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। नीट (NEET) विवाद के बीच अब सीबीएसई (CBSE) के 12वीं के नतीजों और उनकी नई ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली ने छात्रों के भविष्य पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।

रिजल्ट के बाद छिड़ा विवाद 13 मई को 12वीं का परिणाम घोषित होते ही लाखों छात्र स्तब्ध रह गए। साइंस स्ट्रीम के छात्रों, विशेषकर गणित और विज्ञान के विषयों में उम्मीद से बेहद कम अंक मिलने के दावे किए जा रहे हैं। कई ऐसे मेधावी छात्र, जिनका जेईई मेन (JEE Main) स्कोर शानदार रहा, उन्हें बोर्ड परीक्षा में 75 प्रतिशत से कम अंक मिले हैं।

तकनीकी खामी और पोर्टल का क्रैश होना विवाद बढ़ता देख बोर्ड ने छात्रों को उत्तर पुस्तिकाओं की डिजिटल कॉपी लेने और दोबारा जांच (री-इवेल्यूशन) का विकल्प दिया। लेकिन 19 मई को जैसे ही वेबसाइट का लिंक लाइव हुआ, वह 30 मिनट के भीतर ही क्रैश हो गया। 18 लाख छात्रों के लिए बना यह पोर्टल तकनीकी भार नहीं झेल पाया, जिससे छात्रों का आक्रोश और बढ़ गया है।

सवालों के घेरे में मार्किंग सिस्टम विशेषज्ञों का कहना है कि ऑन-स्क्रीन मार्किंग में कॉपियों की खराब स्कैन क्वालिटी और सॉफ्टवेयर की कमियों ने मूल्यांकन को प्रभावित किया है। आरोप है कि बोर्ड ने बिना पुख्ता तैयारी के नया सिस्टम लागू कर दिया, जिसका खामियाजा छात्रों को उठाना पड़ रहा है। सोशल मीडिया पर #BoycottCBSE ट्रेंड कर रहा है और छात्र इसे छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ बता रहे हैं।

बोर्ड का दावा बनाम छात्रों का दर्द जहां एक ओर सीबीएसई के परीक्षा नियंत्रक संयम भारद्वाज का दावा है कि सिस्टम पूरी तरह पारदर्शी और सही है, वहीं हकीकत यह है कि लिंक बार-बार गायब हो रहे हैं और आवेदन की प्रक्रिया अधूरी रह रही है। बोर्ड ने आवेदन की तिथि भले ही 23 मई तक बढ़ा दी हो, लेकिन वेबसाइट की बदहाली ने छात्रों का भरोसा पूरी तरह तोड़ दिया है।

छह साल का सबसे खराब रिजल्ट इस बार का परिणाम पिछले छह वर्षों में सबसे खराब रहा है। पास प्रतिशत गिरकर 85.20 प्रतिशत रह गया है और 95 प्रतिशत से अधिक अंक पाने वाले छात्रों की संख्या महज 0.97 प्रतिशत है। शिक्षकों का भी मानना है कि स्कैनिंग की धुंधली कॉपियां और मूल्यांकनकर्ताओं को सही प्रशिक्षण न मिलना इसका मुख्य कारण हो सकता है।

क्या भविष्य सुरक्षित है? सवाल यह है कि क्या लाखों छात्रों की मेहनत का फैसला एक ऐसे तकनीकी सिस्टम पर छोड़ा जा सकता है जो बुनियादी लोड भी नहीं उठा पा रहा? छात्रों की मांग है कि सीबीएसई पूरी तरह पारदर्शिता बरते, स्कैन कॉपियां मुफ्त उपलब्ध कराए और पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया को सरल बनाए। शिक्षा का यह डिजिटल प्रयोग अब छात्रों के मानसिक तनाव और भविष्य की अनिश्चितता का कारण बनता जा रहा है।

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