मिनाब के मलबे में दफन मासूमियत: अमेरिकी मिसाइल हमले की खौफनाक दास्तान
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दक्षिणी ईरान का मिनाब शहर इन दिनों मातम में डूबा है। तीन महीने पहले एक प्राइमरी स्कूल पर हुए भीषण मिसाइल हमले ने 156 जिंदगियां छीन लीं, जिनमें 120 से अधिक मासूम बच्चे शामिल थे। हमले के बाद सामने आई रिपोर्ट और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं।

मलबे में तब्दील हुआ बचपन 11 साल की परस्तेश ज़ैरी उस समय स्कूल की ऊपरी मंजिल पर थी, जब मिसाइल सीधे इमारत से टकराई। जोरदार धमाके से फर्श ढह गया और वह मलबे में जा गिरी। गंभीर रूप से झुलसने के बाद हफ्तों अस्पताल में रहने के बाद वह तो बच गई, लेकिन उसका 9 साल का भाई अली असगर इस हमले में मारा गया। यह उन सैकड़ों कहानियों में से एक है जो इस तबाही की गवाही दे रही हैं।

प्रार्थना कक्ष बना मौत का जाल हमले की सुबह, जैसे ही स्कूल स्टाफ को ईरान पर हमले की भनक लगी, उन्होंने बच्चों को बचाने की कोशिश की। ज्यादातर लड़कियों को सुरक्षा के लिहाज से ऊपरी मंजिल के प्रार्थना कक्ष में भेज दिया गया। लेकिन यही फैसला घातक साबित हुआ। मिसाइल सीधे उसी हिस्से पर गिरी, जिससे वह हिस्सा पूरी तरह ढह गया और वहां मौजूद बच्चे मलबे में दब गए।

पहचान के लिए डीएनए का सहारा मुहम्मद ताहा, जो उस हमले के दिन अपना 10वां जन्मदिन मनाने वाला था, अब कब्र में है। उसकी मां हदीजा ने बताया कि उसे अपने बेटे के शव की पहचान करने के लिए कई मुर्दाघरों के चक्कर काटने पड़े। अंत में, शरीर के टुकड़ों और डीएनए रिपोर्ट से उसकी पहचान सुनिश्चित हुई। दफनाने से पहले, एक मां ने अपने बेटे के अवशेषों को सीने से लगाकर आखिरी बार लोरी सुनाई।

मिले अमेरिकी मिसाइलों के सबूत स्कूल के मलबे से बरामद अवशेष टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइलों के टुकड़े हैं, जो अमेरिका में बनी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये प्रिसिजन-गाइडेड हथियार थे, जो सवाल खड़े करते हैं कि एक स्पष्ट रूप से चिह्नित सिविलियन स्कूल को निशाना कैसे बनाया गया? यह या तो जानबूझकर किया गया वॉर क्राइम है या फिर एक अक्षम्य टारगेटिंग फेलियर।

जवाबदेही का इंतजार, बढ़ता आक्रोश घटना के तीन महीने बीत जाने के बाद भी वाशिंगटन ने आधिकारिक रूप से अपनी जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की है। अमेरिका का केवल इतना कहना है कि मामले की जांच की जा रही है। जवाबदेही की इस कमी ने पीड़ितों के परिवारों में गहरा आक्रोश भर दिया है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या बच्चों की मौतों का न्याय कभी हो पाएगा?

कब्रिस्तान की बढ़ती कतारें मिनाब का लोकल कब्रिस्तान अब छोटा पड़ने लगा है। हमले में मारे गए बच्चों के लिए इसे बड़ा करना पड़ा है। शहर में अभी एक नाजुक सीजफायर है, लेकिन डर का साया अभी भी गहरा है। हर शाम परिवार कब्रिस्तान में अपने खोए हुए बच्चों को याद करते हैं, इस उम्मीद में कि शायद कभी उन्हें उन सवालों के जवाब मिल सकें कि आखिर उनके बच्चों की जान क्यों ली गई।

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