मंडी-दलालों के चंगुल से क्यों डरते हैं आंदोलनजीवी ? क्या आज के किसान उसी जिद की कीमत चुका रहे हैं
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महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर से एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है। पैठण तालुका के किसान प्रकाश गलधर ने तीन महीने की कड़ी मेहनत के बाद 1262 किलो प्याज मंडी में बेचा। लेकिन जब हिसाब हुआ, तो पता चला कि उन्हें 100 रुपये प्रति क्विंटल यानी 1 रुपये प्रति किलो का भाव मिला। मजदूरी, तुलाई और परिवहन का खर्च जोड़ने पर किसान को अपनी जेब से नुकसान उठाना पड़ा। मीडिया में यह कहानी आज जोर-शोर से छाई हुई है, लेकिन एक सवाल अनुत्तरित है—क्या हम समस्या की जड़ तक जाकर बात करने को तैयार हैं?

मीडिया का अधूरा सच मीडिया अक्सर किसानों की इन दुखद कहानियों को सनसनीखेज बनाकर पेश करता है। पाठक का गुस्सा सरकार की ओर मोड़ दिया जाता है, लेकिन इसके पीछे के बड़े आर्थिक सुधारों और उन बाधाओं का जिक्र नदारद रहता है, जिन्होंने किसान को आज भी उसी पुरानी व्यवस्था में कैद रखा है। किसान की पीड़ा वास्तविक है, लेकिन उस पीड़ा को राजनीतिक एजेंडे में बदलने का सिलसिला सालों से चल रहा है।

वो तीन कृषि कानून, जिन्हें साजिश के तहत रोका गया याद कीजिए, आज से करीब 6 साल पहले केंद्र सरकार तीन कृषि कानून लेकर आई थी। इन कानूनों का मुख्य उद्देश्य यही था कि किसान मंडियों और बिचौलियों की गुलामी से मुक्त होकर अपनी फसल सीधे बाजार में कहीं भी बेच सके। इससे किसानों को प्रतिस्पर्धा मिलती और उनके मुनाफे में बिचौलियों का बड़ा हिस्सा खत्म हो जाता। लेकिन तब कुछ आंदोलनजीवियों और स्वघोषित किसान नेताओं ने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए ऐसा माहौल बनाया, जिससे देश की व्यवस्था ठप हो गई।

भ्रम बनाम सुधार की लड़ाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस समय बार-बार समझाया था कि ये सुधार किसानों को आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, कोल्ड स्टोरेज और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ेंगे। लेकिन तथ्यों के बजाय भ्रम को फैलाया गया। उन कानूनों के समर्थन में खड़े होने वाले मीडिया संस्थानों को गोदी मीडिया कहकर चुप करा दिया गया। उस दौरान सड़कों पर जो अराजकता फैलाई गई, उसने सरकार को अंततः देशहित में कानून वापस लेने पर मजबूर कर दिया।

क्या होता अगर कानून लागू होते? आज जब किसान 1 रुपये किलो प्याज बेचने को मजबूर है और मीडिया के सामने मदद की गुहार लगा रहा है, तो यह पूछना वाजिब है कि वे आंदोलनकारी आज कहां हैं? यदि वे कानून आज लागू होते, तो प्रकाश गलधर जैसे लाखों किसानों के पास अपनी फसल बेचने के लिए एक खुला और प्रतिस्पर्धी बाजार होता। उन्हें मंडी के उन दलालों के सामने हाथ नहीं फैलाने पड़ते जो आज उनकी मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं।

जिम्मेदारी से भागता मीडिया दुर्भाग्यवश, आज वही मीडिया संस्थान किसान की बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं, जिन्होंने उस समय कृषि सुधारों के विरोध में माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सच तो यह है कि उस दौरान फैलाया गया भ्रम ही आज की इस दयनीय स्थिति के लिए जिम्मेदार है। किसानों को बिचौलियों के चंगुल से मुक्त कराने का मौका हमने गंवा दिया, और आज उसकी कीमत देश का अन्नदाता चुका रहा है। क्या अब समय नहीं आ गया कि भावनात्मक खबरों से ऊपर उठकर उन सुधारों पर बात की जाए, जो वाकई किसान को आत्मनिर्भर बना सकते थे?

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