जम्मू-कश्मीर में शराब का हाई-वोल्टेज खेल: बयानों की सियासत और 1.90 लाख बोतलों की हकीकत
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जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का शराब पर दिया गया बयान इन दिनों सूबे की सियासत में उबाल पैदा कर रहा है। शराबबंदी की मांगों के बीच सीएम के तल्ख तेवर और हालिया आंकड़े एक ऐसी तस्वीर पेश कर रहे हैं, जो विवादों के केंद्र में है।

किसी ने घसीटकर नहीं पिलाया : सीएम का बचाव शराबबंदी की मांग पर उमर अब्दुल्ला ने दो टूक जवाब दिया। उन्होंने कहा कि सरकार ने शराब की दुकानें नहीं बढ़ाई हैं और न ही किसी को पीने के लिए मजबूर किया जा रहा है। सीएम के मुताबिक, ये दुकानें उन लोगों के लिए हैं जिनका मजहब उन्हें इसकी इजाजत देता है। उन्होंने साफ किया कि सरकार का मकसद खपत बढ़ाना नहीं, बल्कि व्यवस्था को बनाए रखना है।

सियासी बखेड़ा और अपनों की नाराजगी इस बयान के बाद विपक्ष तो हमलावर है ही, नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर से भी सुर बदले हुए हैं। पार्टी सांसद आगा रुहुल्ला ने खुलकर शराब पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग की है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस बयान ने घाटी में एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या मजहबी इजाजत के नाम पर शराब की बिक्री को उचित ठहराया जा सकता है?

आंकड़ों का आईना: हर दिन बिक रही 1.90 लाख बोतलें विवादों के बीच सामने आए आधिकारिक आंकड़े चौंकाने वाले हैं। वर्ष 2024-25 में जम्मू-कश्मीर में शराब की कुल 6.94 करोड़ बोतलें बिकीं। इसका औसत निकाला जाए तो हर दिन लगभग 1.90 लाख बोतलें लोग खरीद रहे हैं। जनवरी 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, 5.63 करोड़ बोतलें पहले ही बिक चुकी हैं।

कश्मीर से 10 गुना ज्यादा राजस्व, जम्मू है हब शराब की बिक्री से मिलने वाला रेवेन्यू सरकार के खजाने का एक बड़ा हिस्सा है, लेकिन इसमें जम्मू और कश्मीर के बीच भारी अंतर है। आंकड़ों के अनुसार:

राजस्व का सबसे बड़ा केंद्र: जम्मू जिला अकेले जम्मू जिले की बात करें तो 2024-25 में यहां से 509 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ, जबकि घाटी में सबसे ज्यादा कमाई देने वाले श्रीनगर जिले से यह आंकड़ा मात्र 65.57 करोड़ रुपये रहा। फिलहाल, शराब की यह बिक्री सरकारी खजाने के लिए तो फायदेमंद है, लेकिन उमर अब्दुल्ला के बयानों ने इसे ऐसा राजनीतिक मुद्दा बना दिया है जिसे सुलझाना आसान नहीं होगा।

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