दिल्ली में ब्रिक्स (BRICS) का महामंथन: बदलती वैश्विक बिसात और भारत की अग्निपरीक्षा
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राजधानी दिल्ली 14 और 15 मई 2026 को ब्रिक्स (BRICS) विदेश मंत्रियों की बैठक की मेजबानी करने के लिए तैयार है। यह आयोजन ऐसे समय में हो रहा है जब दुनिया गहरे भू-राजनीतिक संकटों से घिरी है। ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर मंडराते खतरे ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कनें बढ़ा दी हैं।

भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन की चुनौती भारत इस बैठक के जरिए ग्लोबल साउथ के नेता के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है। हालांकि, नई दिल्ली के सामने सबसे बड़ी चुनौती ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी मंच बनने से रोकने की है। भारत को एक तरफ अमेरिका और क्वाड देशों के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को संभालना है, तो दूसरी तरफ ब्रिक्स की एकजुटता भी बनाए रखनी है।

ऊर्जा संकट और भारत की चिंता बैठक का सबसे महत्वपूर्ण एजेंडा ऊर्जा सुरक्षा है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर आता है। क्षेत्र में तनाव बढ़ने का सीधा असर भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर पड़ सकता है। यही कारण है कि इस बैठक के दौरान भारत और ईरान के बीच ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा पर अलग से बातचीत अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

चीन की संभावित दूरी और रणनीतिक बदलाव इस बैठक में चीन के विदेश मंत्री वांग यी के शामिल न होने की खबरें चर्चा का विषय बनी हुई हैं। माना जा रहा है कि बीजिंग अपनी बदलती रणनीतिक प्राथमिकताओं और अमेरिका के साथ चल रही बातचीत के कारण किसी निचले स्तर के प्रतिनिधि को भेज सकता है। चीन, जो ईरानी तेल का बड़ा खरीदार है, इस पूरे संकट में एक प्रमुख खिलाड़ी है, जिस पर वाशिंगटन की भी पैनी नजर है।

ईरान की भागीदारी पर टिकी सबकी नजरें इस बैठक में ईरान के विदेश मंत्री सईद अब्बास अराघची का आना एक बड़ा संदेश है। ब्रिक्स में ईरान का शामिल होना यह दर्शाता है कि यह संगठन अब केवल आर्थिक मंच नहीं, बल्कि जटिल राजनीति का केंद्र बन चुका है। दिल्ली में होने वाली यह बैठक न केवल वैश्विक भविष्य की दिशा तय करेगी, बल्कि यह भी दिखाएगी कि क्या भारत दुनिया के दो ध्रुवों के बीच कूटनीतिक संतुलन बनाने में सफल रहता है या नहीं।

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