बंगाल का भगवा उदय: दशकों बाद दबी हुई सनातनी आस्थाओं को मिली नई पहचान
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पश्चिम बंगाल की राजनीतिक फिजा बदली है और इसके साथ ही राज्य का सांस्कृतिक रंग भी बदलता दिख रहा है। चुनावी परिणामों के बाद राज्य की सड़कों और मोहल्लों में एक अलग ही आत्मविश्वास और वैचारिक बदलाव देखने को मिल रहा है। दशकों से अल्पसंख्यक की तरह महसूस करने वाली 70 प्रतिशत सनातनी आबादी अब अपनी धार्मिक पहचान को खुलकर पुनर्स्थापित कर रही है।

तुष्टीकरण के बंधन से आजाद होता बंगाल बंगाल में लंबे समय तक तुष्टीकरण की राजनीति हावी रही। सरकारी दफ्तरों से लेकर सड़कों तक, सनातनी परंपराओं को सीमित करने का प्रयास किया गया। कहीं दुर्गा विसर्जन की तारीखें टलीं, तो कहीं रामनवमी की शोभायात्राओं पर प्रशासनिक पाबंदियां लगाई गईं। अब सत्ता में आए बदलाव के साथ ही लोग इस सरकारी अंकुश और वैचारिक गुलामी से मुक्ति का जश्न मना रहे हैं।

15 वर्षों का इंतजार और खुलते मंदिर बदलाव की तस्वीरें राज्य के कोने-कोने से सामने आ रही हैं। पश्चिम बर्धमान के पांडाबेश्वर में पुलों पर भगवा ध्वज लहरा रहे हैं। वहीं, आसनसोल के बस्तीन बाजार में एक दुर्गा मंदिर, जिसे 15 सालों तक कानूनी और प्रशासनिक अड़चनों के कारण बंद रखा गया था, अब नियमित पूजा-पाठ के लिए खुल चुका है। यह घटना दर्शाती है कि कैसे आम जनता अपनी आस्था के लिए वर्षों तक संघर्ष करती रही थी।

मुर्शिदाबाद में बदली हवा मुर्शिदाबाद, जो कभी धार्मिक पाबंदियों और लाउडस्पीकर के समय निर्धारण को लेकर चर्चा में रहता था, वहां अब सड़कों पर जय श्री राम के नारे गूंज रहे हैं। रेलवे कॉलोनी के जिस पूजास्थल को वक्फ संपत्ति का नाम देकर 50 वर्षों तक बंद रखा गया था, वहां अब फिर से पूजा-पाठ शुरू हो गई है। बीएसएफ की निगरानी में अपनी आस्था को वापस पाकर श्रद्धालु बेहद उत्साहित हैं।

वैचारिक बदलाव का प्रतीक: भगवा ध्वज यह सिर्फ राजनीतिक जीत नहीं, बल्कि एक वैचारिक बदलाव है। स्थिति इतनी बदल चुकी है कि ममता बनर्जी के भतीजे और सांसद अभिषेक बनर्जी के घर की छत पर भी हनुमान जी का चित्र युक्त भगवा झंडा दिखाई दिया। सरकारी दफ्तरों से लेकर गलियों तक, लोग अब अपनी संस्कृति को बिना किसी डर के व्यक्त कर रहे हैं।

सांस्कृतिक चेतना की पुनरावृत्ति स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की धरती बंगाल ने सदैव भारत को आध्यात्मिक नेतृत्व दिया है। सनातनी समाज अब महसूस कर रहा है कि उनकी संस्कृति पर कैंची चलाने का दौर समाप्त हो गया है। बंगाल के लोग अब यह मान रहे हैं कि दुर्गा पंडालों की आरती का समय अजान देखकर तय नहीं होगा और न ही आस्था को किसी विशेष वर्ग की तुष्टीकरण के लिए दबाया जाएगा।

बदलता बंगाल इस बात का प्रमाण है कि जब जनता का आत्मविश्वास जागता है, तो न केवल राजनीति, बल्कि सोच और पूरी व्यवस्था का रंग भी बदल जाता है।

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